रह रह के चिलमन से झांक जाते हैं
रह रह के चिलमन से झांक जाते हैं
हर बार हमको वंही पर खड़ा पाते हैं
झट से परदा सरका के लौट जाते हैं
कुछ सोचते हैं मुस्काते हैं झुंझलाते हैं
टी वी ऑन करके चैनल कई बदलते हैं
कभी पुरानी किताब के पन्ने पलटाते हैं
कभी बेवज़ह पंखा तो कभी घड़ी देखते हैं
दो चार फालतू फालतू फ़ोन घनघनाते हैं
फिर अचानक चिलमन पे लौट आते हैं
हमको वंही पा के फिर झुंझला जाते हैं
देख देख कर उनकी ये बेचैनी बेकरारी
हम सोचते हैं वे हमारे लिए ही आते हैं
मुकेश इलाहाबादी -------------------------
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