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Sunday, 7 September 2014

सांझ होते ही चहचहाने लगे

सांझ होते ही चहचहाने लगे
पंछी अपने नीड में जाने लगे
इधर रात गहराने लगी उधर
चाँद - सितारे जगमगाने लगे
नींद पलकों में डेरा जमा चुकी
ख्वाब अपने पंख फैलाने लगे
जैसे - जैसे रात गहरा रही है
तुम मुझे और याद आने लगे
जो ज़ख्म दिन में सो गए थे
रात होते ही मुस्कुराने लगे

मुकेश इलाहाबादी -----------