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Tuesday, 1 September 2015

तेरा ज़िक्र आते ही मुस्कुरा देता हूँ

तेरा ज़िक्र आते  ही  मुस्कुरा देता हूँ 
दुनिया वाले समझते हैं मै अच्छा हूँ 

यूँ तो सिफत मेरी बर्फ की है, मगर 
तेरे पास आते ही मै पिघल जाता हूँ 

मेरे वज़ूद में पानी  की  रवानी भी है 
पर तेरा संग साथ पा सुलग जाता हूँ 

अक्सर मै चुप चुप ही रहा करता हूँ 
गुफ्तगू तो मै सिर्फ  तुमसे करता हूँ  

मै  सिर्फ तेरी बातें कहता सुनता हूँ 
लोग समझते हैं, मै ग़ज़लें कहता हूँ 


मुकेश इलाहाबादी ---------------------

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