सांवली कजरारी रात थी
तुमसे
मुलाकत की
वो सांवली कजरारी रात थी
जब तुम
किसी बात पे
खिलखिला के हँसी थी
और
झर झर झरे थे
हरश्रृंगार,
टोकरा भर के
जिन्हे मैंने
अपनी अंजुरी में समेट
उछाल दिया था
अनंत आकाश में
और यह आकाश
सुरमई और सुर्ख
जिसमे
उग आये थे तमाम
चमकते सितारे
और ,,,, उनके बीच एक चाँद
जो मेरी मुठ्ठी में था उस रात
मुस्कुराता हुआ
महकता हुआ
हरश्रृंगार की तरह
(सुमी , याद है न तुम्हे ये सब - सच सच बताना )
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------
मुकेश इलाहाबादी ------
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