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Wednesday, 7 December 2016

माथे पे जब सज जाती है ये बिंदिया

माथे पे जब सज जाती है ये बिंदिया
सभी को बहुत लुभाती है ये बिंदिया

हथेली के बीच ले के चूमूँ तेरा चेहरा
अँधेरे में भी जगमगाती है ये बिंदिया

अपनी जगह से फ़ैल के ये कुमकुम
रात की कहानी बताती है ये बिंदिया

आसमाँ के आँचल में सुबह का सूरज
किरणों सा फ़ैल जाती है ये बिंदिया

माँ के माथे पे गरिमा लगे, पत्नी के
माथे पे बहुत इठलाती है ये बिंदिया

मुकेश, थोड़ा सा भी प्यार मांगे तो
बहुत नखरे दिखाती है, ये बिंदिया


मुकेश इलाहाबादी ----------------------

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