फिर बहुत बरसा है मन

फिर बहुत बरसा है मन
तुम बिन तड़पता है मन

तू अब किसी ग़ैर की है
क्यूँ नहीं मानता है मन

रातों -दिन समझाता हूँ
मेरी कहाँ सुनता है मन  

दिन,परिंदे से उड़ता है
साँझ, चहचाता है मन

इक बार, तू भी बता दे
क्या कहता है तेरा मन


मुकेश इलाहाबादी -----

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