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Sunday, 25 June 2017

विशुद्ध प्रेम

सुमी ,

जानती हो ?
जब कभी ख़ुद को भावों के गहन गह्वर तल में पाता हूँ , या प्रेम की विशेष भावदशा में उतरता हूँ तो लगता है 'मै ' सिर्फ 'मै ' नहीं, और 'तुम ' सिर्फ 'तुम ' नहीं।
उस वक़्त 'तुम' और 'मै ' का 'द्विजत्व' समाप्त हो जाता है। सिर्फ और सिर्फ 'एकत्व ' शेष रहता है।  जंहा अद्भुत आनन्द बरसता है।  अहर्निश 'अनहलक ' 'अहम् 'ब्रम्हाशमी' की गूँज होती रहती है।  जिसमे डूबे रहने का जी चाहता है, बने रहने का मन करता है ,
किन्तु ,
 इस भावदशा के उत्थान होते ही, आँख खुलते ही यही 'एकत्व' फिर और फिर द्विजत्व में  तब्दील हो जाता है, और फिर 'तुम ' तुम हो जाती है, मै  फिर से 'मै ' हो
जाता हूँ ,  यही द्विजत्व द्वन्द में तब्दील हो जाता है।  तुम मेरी परछाई बन जाती हो, और मै एक बार फिर एकत्व के लिए उसी आनन्द के लिए उसी भावदशा में
डूबने के लिए , अपनी 'परछाई' यानी 'तुम्हे' पकड़ने के लिए भागने लगता हूँ।  मै  जितनी जोर से भागता हूँ  तुम्हारी परछाई उतनी ही तेज भागने लगती है।  मै
और तेज़ भागने लगता हूँ।  तुम और तेज़ दौड़ने लगती हो।  मै धीमे हो जाता हूँ तुम भी धीमे हो जाती हो , 'मै ' हाँफने लगता हूँ ''तुम' भी हाँफती हुई रुक जाती हो। 'मै' झपट कर 'तुम्हे' पकड़ना चाहता हूँ, हर बार हथेलियाँ रीती रह जाती हैं। तुम मुझसे अलग खड़ी मुस्कुराती रहती हो।
मै फिर भागने लगता हूँ , तुम फिर भागने लगती हो।  भागते भागते दिन का सूरज डूब जाता है , सांझ उतर आती है , परछाई और बड़ी होने लगती है, मेरी
हताशा और बढ़ जाती है।
धीरे -धीरे यही सांवली परछाई गहन रात में तब्दील हो चुकी होती है। काली गहरी परछाई वाली रात , और मै डूब जाता हूँ, थक कर गहरी नींद में सो जाता हूँ , जो
एक गहरी भावदशा होती है , जंहा फिर से विशुद्ध प्रेम