बादलों से रोशनी छन-छन के हमपे आने लगी हैं
अब खामोशियाँ आप की हमसे बतियाने लगी हैं
मुकेश हम तो चुपचाप बैठ गए थे दरिया किनारे
अब तो हमसे लहरें रह - रह के बतियाने लगी हैं
मुकेश इलाहाबादी --------------------------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”