कुछ भीड़ में खो गए कुछ मसरूफ हो गए

कुछ भीड़ में खो गए कुछ मसरूफ हो गए
कुछ हमसे दूर हो गए कुछ मगरूर हो गए

बहुत कोशिशें की, रिश्ते  बनाए रखने की
आखिरकर  हम भी औरों की तरह हो गए

मिज़ाज़पुर्शी के लिए भी कोई नहीं आता
शहर भर के लिए हम बासी खबर हो गए

मेहराबों पे सिर्फ कबूतर गुटुर-गुं करते हैं
कभी हवेली थे अबतो हम खंडहर हो गए

फूल सा खिलने की चाहत थी हमें मुकेश
ज़माने का हुआ असर कि, पत्थर हो गए

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

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