न धूप खिलेगी न पानी रहेगा न हवा बहेगी

न धूप खिलेगी न पानी रहेगा न हवा बहेगी
प्रकृति के साथ खेलोगे तो त्राहि त्राहि मचेगी

जिस तरह रोज़ जंगल और पहाड़ कट रहे है
देखना आसमान से पानी नहीं आग बरसेगी

सत्ता के मद में ये बात मत भूलो सात्तदेशों
अगर जनता चाह लेगी तो तुम्हे कुचल देगी


मुकेश इलाहाबादी -------------------------

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