प्रेम में पड़ा पुरुष

एक
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प्रेम
में पड़ा पुरुष
अपने जिस पुरुषत्व को
सिर पे शान से
पगड़ी सा सजाए रहता है
उसे ही खुशी - खुशी रख देता है
अपनी प्रेयषी के कदमो पे
और हो जाता है
एक स्त्री से भी ज़्यादा स्त्री
दो
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प्रेम में पड़े
पुरुष के
भूजाओं की
सशक्त मशल्स
तब्दील हो कर
मछलियों सा
तैर जाना चाहती हैं
प्रेयषी के आँखों की झील में
तीन
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प्रेम में पुरुष
पत्थर नहीं मोम हो जाता है
और गल गल के बन जाता है
कभी स्त्री
तो कभी मछली
तो कभी झूला जिसमे जिसमे ले सके पेंगे
उसकी प्रेयसी बसंत में
और बरस जाता है लाल गुलाल फागुन में उसके
गजलों पे बालों में
मुकेश इलाहाबादी -----------

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