पिछला साल जाते -जाते कह गया था

पिछला
साल जाते -जाते कह गया था
अब मै
लौट कर नही आऊंगा
इसके पहले वाले साल ने भी, यही बात कही थी
जाते - जाते,
ठीक अभी अभी गुज़रे लम्हे ने भी यही कहा
और आगे बढ़ गया
जनता हूं आने वाले लम्हे भी एक पल ठहरेंगे
आगे बढ़ जाएंगे
लेकिन इंसान
तस्वीरों मे
कविताओं मे,
कहानियों और
संस्मरणों मे इन अनवरत
बहते हुए लम्हों को या
कह सकते हो वक्त को
अपनी मुट्ठी मे
कैद करता है
पर कई बार कुछ लम्हे
ख़ुद ब ख़ुद इंसान की पलकों पे
हमेशा-हमेशा के लिए ठहर जाते हैं
खुशी की ठहरी नीली झील सा
या फिर दर्द के हरहराते समंदर सा
लेकिन मेरे दिल मे
तुम्हारे साथ
गुजारे हुए लम्हे
कील सा
ठुक गए हैं
और रिसते रहते हैं
किसी नासूर की तरह
जिसपे मैंने टांग दी है
तेरी
यादों की सतरंगी छतरी
जिसे तान कर
हम बचते हुए चलते थे धूप से
बारिश से
मुकेश इलाहाबादी,,,,,

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