ये उदासी लिबास होती

ग़र
ये उदासी लिबास होती
जिस्म से उतार देता
तेरी हँसी से
मैं ख़ुद को
संवार लेता
इक दरख्त
भी जो राह मे मिल जाता
उम्र तमाम उसी की छांह में मैं गुजार देता
इश्क किया था
कोई तिजारत तो नहीं
लिहाजा सब कुछ लुट कर भी उससे मैं
क्या हिसाब लेता
मुकेश इलाहाबादी,,,,,

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