जब कभी

जब कभी
तुम, मेरी चाय या कॉफी की डिमांड पे
हलके से मुँह चिढ़ा के चल देती हो
किचेन में चाय का अदहन चढाने
या कि
यदि मै ऊँघ रहा होता हूँ
या कि सो रहा होता हूँ
और तुम चुपके से आ के मेरे कानो में
कागज़ की फुरेरी बना गुदगुदा देती हो
और मेरी नाराज़गी पे खिलखिला देती हो
या कि
कभी लाड में आ
मेरी नाक को
तर्जनी और अंगूठे से पकड़
तुम अपनी भौहों को उचका के
मुस्कुरा देती हो
तब तुम बहुत अच्छी लगती हो
रियली, तुम्हारी तरह
तुम्हारी शरारतें भी कित्ती मासूम है
मुकेश इलाहाबादी -----------

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