मै
कोई सूरज थोड़े ही हूँ
कि दिन भर की थकन के बाद
रात मुझे ओढ़ के सो जाए
मुझे तो चमकना होता है
हर रोज़
हर रात
आकाश के उत्तरी ध्रुव पे
और निहारना होता है
अपनी धरती को
जो लाखों प्रकाशवर्ष की दूरी पे
नाच रही होती है
अपना सतरंगी आँचल ओढ़े
मस्ती से
आवारा चाँद के लिए
(सुमी से ,,,,,,,,,,,)
मुकेश इलाहाबादी -----------
जी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (११-०७-२०२१) को
"कुछ छंद ...चंद कविताएँ..."(चर्चा अंक- ४१२२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
उम्दा सृजन।
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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