जिस्मो जॉ पे फफोले यूँ ही नहीं पड़े हैं साहेब

 जिस्मो जॉ पे फफोले यूँ ही नहीं पड़े हैं साहेब

ज़िंदगी ने हमें आग के निवाले दिए हैं साहेब
फ़क़त हौसला और चंद असबाब ले के चले थे
जो कुछ भी है कड़ी मेहनत से पाये हैं साहेब
न चाँद न सूरज न सितारों ने किया उजाला
खुद को जलाया तो रोशनी में आये हैं साहेब
चढ़ी चढ़ी सी आँखे और लड़खड़ाते से कदम
इक अरसा हुआ चैन से नहीं सोये हैं साहेब
चंद सिक्कों में बिकी जाती है ये दुनिया और
हम हैं कि साथ जज़्बात लिए फिरते हैं साहेब
मुकेश इलाहाबादी --------------------------

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