एकतरफ़ा उजाला
जैसे किसी बंद कमरे में
मैंने ख़ुद ही एक दीया जला लिया हो,
और उसकी लौ
सिर्फ़ मेरी आँखों को रोशन करती हो।
तुम्हारी तरफ़
शायद अभी भी सांझ है,
या किसी और रोशनी की चमक
मगर मेरे भीतर
तुम्हारे नाम का एक चिराग़
बिना हवा के भी जलता रहता है।
मैंने कई बार
उसे बुझाने की कोशिश की
हथेलियों से ढाँपकर,
आँखें मूँदकर,
वक़्त की धूल से ढककर।
पर अजीब बात है—
वो लौ और साफ़ हो जाती है,
जैसे उसे मेरी ही साँसों से
रौशन रहना हो।
एकतरफ़ा उजाला
कोई शिकायत नहीं करता,
वो हिसाब नहीं रखता
कि सामने से कितनी रोशनी आई।
वो बस जलता है
अपने यक़ीन की बाती पर,
अपने सब्र के तेल से।
कभी-कभी
इस रोशनी में
तुम्हारा चेहरा उभर आता है
धुंधला,
मगर क़रीब।
कभी तुम्हारी हँसी
इस दीये की लौ में काँपती है,
कभी तुम्हारी ख़ामोशी
उसके चारों ओर
एक हल्का-सा साया बना देती है।
लोग कहते हैं
इश्क़ दो तरफ़ा हो
तो मुकम्मल होता है।
मगर मुझे लगता है
एकतरफ़ा उजाला भी
कम नहीं होता।
वो किसी की राह रोशन करने के लिए नहीं,
अपने दिल के अँधेरों को हराने के लिए जलता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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