लटों के सिरहाने सोई हुई रात
तुम्हारी लटों के सिरहाने
जब रात आकर लेट जाती है,
लगता है जैसे अँधेरा भी
सुकून ढूँढता हुआ
तुम तक चला आया हो।
कंधों पर बिखरे वे केश
किसी शांत जंगल जैसे,
जहाँ चाँदनी पगडंडी बनाकर
धीरे-धीरे उतरती है।
रात वहाँ शोर नहीं करती,
बस हल्की-सी साँस लेती है
मानो तुम्हारी खुशबू में
अपने सपनों को घोल रही हो।
तुम ज़रा-सा करवट लेती हो,
तो वो सोई हुई रात
भी करवट बदलती है
लटों के बीच
कुछ तारे टिमटिमा उठते हैं।
उस अँधेरे में
कोई डर नहीं होता,
बस एक गहरा-सा अपनापन
जैसे रात ने
अपना घर चुन लिया हो।
तुम्हारी लटों के सिरहाने
सोई हुई वह रात
हर सुबह से पहले
मुझे यह एहसास दे जाती है
कि उजाला भी
किसी गहरे साए से ही जन्म लेता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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