तू आई
तो लगा वक़्त ने
अपनी रफ़्तार को
हल्का-सा मुस्कुरा कर तेज़ कर दिया।
दिन अचानक
छोटे लगने लगे,
और शामें
बिना आहट के
आँगन में उतर आने लगीं।
तेरी आँखों में
ख़्वाबों की रौशनी है,
तेरे सीने में
आरज़ुओं की गरम धड़कन।
मगर ऐ नाज़नीन,
वक़्त की फितरत
ठहरना नहीं होती—
वो तो हर हुस्न से
चुपके-चुपके
आगे निकल जाता है।
इसलिए
जो मोहब्बत तेरे दिल में है
उसे जी ले,
जो ख़्वाब तेरी पलकों पर हैं
उन्हें सजा ले।
क्योंकि
ज़िंदगी की उम्र
शायद बस इतनी है
एक सुबह की चमक
और एक शाम की
मुकेश्,,,
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