खिड़की पर ठहरा हुआ तुम्हारा ख़याल
खिड़की पर
ठहरा हुआ है
तुम्हारा एक ख़याल।
हवा आती है,
पर उसे
उड़ा नहीं ले जाती।
परदे हल्के-हल्के
हिलते रहते हैं,
और शाम की रोशनी
धीरे-धीरे
कमरे में उतरती है।
लगता है
जैसे
तुम्हारा ख़याल
भी
यहीं कहीं बैठा है
चुपचाप।
मुकेश्,,,,,
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