समय की उँगलियों के निशान
समय
कभी शोर नहीं करता,
वह चुपचाप
हमारे चेहरों पर
अपने उँगलियों के निशान छोड़ता जाता है।
पहले
सिर्फ़ एक हल्की सी रेखा बनती है,
जैसे किसी बच्चे ने
काग़ज़ पर पहली बार
पेंसिल रखी हो।
फिर धीरे-धीरे
वे रेखाएँ गहरी होने लगती हैं,
और एक दिन
चेहरा खुद ही
समय की लिखी हुई
एक पूरी कहानी बन जाता है।
लोग समझते हैं
यह उम्र का असर है,
पर सच तो यह है
कि यह उन रास्तों की धूल है
जिन पर हम चलते रहे।
हर रेखा
किसी दिन की थकान है,
किसी रात का इंतज़ार,
किसी अधूरे सपने की
धीमी सी परछाईं।
समय
कभी किसी से पूछता नहीं,
बस अपनी उँगलियाँ
आँखों के किनारों पर रख देता है
और वहाँ
एक नई लकीर उभर आती है।
लेकिन अजीब बात यह है
इन लकीरों में
सिर्फ़ बीते हुए दिन नहीं होते,
इनमें वह रोशनी भी होती है
जो आदमी
अपने अनुभव से अर्जित करता है।
इसलिए
जब अगली बार
आईने में अपना चेहरा देखो,
तो समझना—
वह सिर्फ़ एक चेहरा नहीं है,
बल्कि समय की उँगलियों से लिखी हुई
एक गहरी किताब है।
और उस किताब में
तुम्हारी ज़िन्दगी का हर मौसम
धीरे-धीरे
अपनी जगह बना चुका है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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