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Monday, 16 March 2026

जब चेहरा आईने से प्रश्न करता है

जब चेहरा आईने से प्रश्न करता है


कभी-कभी

सुबह की पहली रोशनी में

जब आदमी आईने के सामने खड़ा होता है,

तो उसे लगता है

जैसे वह किसी और से नहीं

अपने ही समय से मिल रहा हो।


आईना

सिर्फ़ शक्ल नहीं दिखाता,

वह उन दिनों की परछाइयाँ भी दिखाता है

जो चुपचाप बीत गए।


चेहरा धीरे-धीरे

आईने से प्रश्न करता है

क्या यह वही आदमी है

जो कभी सपनों के पीछे

बिना थके चला करता था?


आईना चुप रहता है,

क्योंकि उसके पास

सच के अलावा

कहने को कुछ नहीं होता।


चेहरे की कुछ लकीरें

समय की लिखी हुई पंक्तियाँ हैं,

कुछ मुस्कानें

बीते हुए मौसमों की याद।


और आँखों के भीतर

अब भी कहीं

एक छोटा सा आकाश बचा है

जहाँ उम्मीद की

एक अकेली चिड़िया उड़ती रहती है।


कभी-कभी

आदमी आईने से यह भी पूछता है

क्या जो कुछ बीत गया

वह सचमुच बीत गया है?


आईना फिर भी कुछ नहीं कहता,

बस रोशनी को

चेहरे पर रख देता है

जैसे कोई मौन गुरु

शिष्य के सामने

एक दीपक जला दे।


तब धीरे-धीरे

आदमी समझने लगता है

कि आईना उत्तर नहीं देता

वह सिर्फ़

प्रश्नों को और साफ़ कर देता है।


और शायद

यही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है

कि हम अपने चेहरे में

समय को देखते हैं,

और समय के आईने में

धीरे-धीरे

अपने आप को।


मुकेश ,,,,,,

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