“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
किताब के बीच दबा हुआ फूल
किताब के बीच
दबा हुआ एक फूल मिला।
रंग अब
पहले जैसा नहीं रहा,
खुशबू भी
कहीं दूर चली गई है।
पर पन्नों के बीच
अब भी
एक पुरानी दोपहर
चुपचाप सो रही है।
लगता है
किसी ने
एक याद को
समय से बचाकर
यहीं रख दिया था।
मुकेश्,,,,
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