“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
बंद खिड़की पर ठहरी धूप
बंद खिड़की पर
ठहरी हुई है
थोड़ी-सी धूप।
जैसे
किसी ने
रोशनी को बाहर ही रोक दिया हो।
कमरे के भीतर
ख़ामोशी है,
और बाहर
दोपहर
धीरे-धीरे गुजर रही है।
धूप फिर भी
वहीं ठहरी है—
मानो इंतज़ार में हो
कि कोई
खिड़की खोल दे।
मुकेश्,,,,
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