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Friday, 13 March 2026

बंद खिड़की पर ठहरी धूप

 बंद खिड़की पर ठहरी धूप

बंद खिड़की पर

ठहरी हुई है

थोड़ी-सी धूप।

जैसे

किसी ने

रोशनी को बाहर ही रोक दिया हो।

कमरे के भीतर

ख़ामोशी है,

और बाहर

दोपहर

धीरे-धीरे गुजर रही है।

धूप फिर भी

वहीं ठहरी है—

मानो इंतज़ार में हो

कि कोई

खिड़की खोल दे। 

मुकेश्,,,, 

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