“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मेज़ पर छूटी हुई कलम
मेज़ पर
छूटी हुई है
एक कलम।
स्याही अब भी है,
पर शब्द
कहीं रुक गए हैं।
शायद
कोई वाक्य
आधा लिखकर
सोच में खो गया होगा।
काग़ज़ चुप है,
कलम भी चुप है—
मुकेश्,,,,,
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