वह स्त्री एक फ़ाइनैन्स मैनेजर है।
कोलकता की उस ऊँची इमारत में
वह स्त्री
एक फ़ाइनैन्स मैनेजर है।
सुबह से
उसकी स्क्रीन पर
अंकों की नदियाँ बहती रहती हैं
लाभ, हानि, ग्राफ़,
बजट की लंबी सुरंगें,
और ईमेलों के अंतहीन पुल।
वह बड़ी शांति से
करोड़ों के हिसाब सँभालती है,
जैसे कोई नाविक
तूफ़ानी समुद्र में
जहाज़ का संतुलन बचाए रखता हो।
कॉल पर उसकी आवाज़
सधी हुई रहती है
“रिपोर्ट शाम तक भेज दी जाएगी…”
“हाँ, यह प्रोजेक्शन सुरक्षित है…”
लेकिन इन वाक्यों के पीछे
कितनी थकान छिपी है,
यह कोई एक्सेल शीट नहीं जानती।
दोपहर में
वह कुछ देर बालकनी में आती है,
नीचे शहर
धूप में चमकते सिक्कों-सा दिखाई देता है।
हवा में
दूर कहीं से आती
ट्राम की घंटी घुलती है,
और उसे अचानक याद आता है
कि कभी उसने
संख्याओं नहीं,
बारिशों और यात्राओं के सपने देखे थे।
फिर वह लौट जाती है
अपने लैपटॉप के सामने
जहाँ हर दिन
वह दूसरों के खातों को संतुलित करते-करते
धीरे-धीरे
अपने भीतर का असंतुलन छिपाती रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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