वह स्त्री जो स्वयं को समझने से थोड़ा पहले रुक जाती थी
अब जब उसकी उम्र प्रौढ़ता में प्रवेश कर चुकी है, तो उसके व्यक्तित्व की चमक पहले जैसी तीखी नहीं रही, लेकिन उसमें एक प्रकार की स्थिर गरिमा आ गई है।
कुछ लोग उम्र के साथ टूटते हैं।
कुछ लोग व्यवस्थित हो जाते हैं।
और कुछ ऐसे भी होते हैं जो बाहर से व्यवस्थित दिखाई देने लगते हैं, जबकि भीतर की उलझनें केवल अधिक सभ्य हो जाती हैं।
वह तीसरी तरह की स्त्री थी।
अब वह बहुत संयत स्वर में बोलती है। उसकी हँसी धीमी और शिष्ट है। उसमें वह खुलापन नहीं जो युवावस्था में लोगों को असुरक्षित बना देता है। बल्कि एक नपी-तुली आत्मनियंत्रित गर्मी है — इतनी कि सामने वाला सहज रहे, लेकिन उतनी नहीं कि वह बहुत भीतर आ सके।
उसे फूहड़ता से लगभग घृणा है।
बहुत ऊँची आवाज़ में बोलने वाले लोग, गन्दे कपड़े, अस्त-व्यस्त घर, भोजन करते समय शोर, बिना सोचे बोल देना — ये सब चीज़ें उसे भीतर से असहज कर देती हैं।
उसका अपना घर हमेशा व्यवस्थित रहता है। किताबें करीने से, परदे साफ़, कपों के नीचे कोस्टर, और मेज़ पर अक्सर ताज़े फूल।
उसके भीतर संवेदनशीलता भी है। वह किसी की तकलीफ़ सुन सकती है, देर तक बातचीत कर सकती है, और कई बार लोगों को सचमुच राहत महसूस होती है उससे बात करके।
लेकिन जितना अधिक मैं उसे जानता गया, उतना अधिक मुझे लगा कि उसके भीतर अपने बारे में एक गहरी गलतफ़हमी भी है।
उसे विश्वास है कि वह बहुत आध्यात्मिक स्त्री है।
अक्सर उसे गम्भीर पुस्तकों के साथ देखा जा सकता है — उपनिषद, बुद्ध, कृष्णमूर्ति, अस्तित्ववाद, ध्यान, ऊर्जा, चेतना, स्त्री-शक्ति, तंत्र, ज्योतिष।
वह महँगा reading glass लगाकर पढ़ती है। उस समय उसके साँवले चेहरे और तीखी आँखों में सचमुच एक आकर्षण होता है।
जैसे वह किसी गहरे आन्तरिक जीवन वाली स्त्री हो।
लेकिन यदि चर्चा थोड़ी गहराई में चली जाए, तो जल्दी समझ में आने लगता है कि उसका आध्यात्मिक संसार अधिकतर बौद्धिक सजावट और भावनात्मक सांत्वना का मिश्रण है।
वह देवी-देवताओं को मानती है। पूजा-पाठ करती है। ग्रहों, ऊर्जा, नज़र, कर्म, पिछले जन्म और “वाइब्रेशन” जैसी बातों पर विश्वास करती है।
कभी-कभी बड़े विश्वास से कोई ज्योतिषीय निष्कर्ष भी बोल देती है, जबकि उसे स्वयं उस विषय की बहुत गहरी जानकारी नहीं होती।
उसका आध्यात्मिक झुकाव ज्ञान की कठोर खोज से अधिक आत्म-छवि का हिस्सा था।
शायद उसे यह विश्वास अच्छा लगता था कि वह सामान्य लोगों से कुछ अधिक जागरूक, अधिक refined, अधिक inward-looking है।
लेकिन यह पूरी तरह झूठ भी नहीं था।
वह सचमुच औसत से थोड़ी अधिक संवेदनशील और बौद्धिक थी। समस्या केवल यह थी कि उसने अपनी उस आंशिक गहराई को अन्तिम गहराई मान लिया था।
एक बार मैं उसके घर गया। शाम थी। हल्की पीली रोशनी कमरे में फैली हुई थी। वह एक कुर्सी पर बैठी कोई आध्यात्मिक पुस्तक पढ़ रही थी। reading glass उसकी नाक पर थोड़ा नीचे खिसका हुआ था।
उसने किताब बन्द की और मुस्कुराकर पूछा —
“तुम्हें नहीं लगता कि दुनिया बहुत सतही हो गई है?”
उसके स्वर में हल्की थकान थी।
मैंने कहा —
“दुनिया शायद हमेशा से ऐसी थी।”
वह कुछ क्षण चुप रही। फिर बोली —
“नहीं… अब लोग भीतर की यात्रा नहीं करते।”
उस समय मुझे अचानक लगा कि वह यह बात दूसरों के बारे में कम, अपने बारे में अधिक कह रही है।
क्योंकि उसके भीतर सचमुच एक खोज थी।
लेकिन वह खोज हर बार एक निश्चित सीमा पर आकर रुक जाती थी — ठीक वहाँ, जहाँ मनुष्य को अपने भ्रमों से सामना करना पड़ता है।
वह ध्यान, आत्मा, ऊर्जा, कर्म — इन सब पर बात कर सकती थी।
लेकिन यदि बातचीत उसके अपने भय, ईर्ष्या, अकेलेपन, उम्र या असफल सम्बन्धों की ओर मुड़ती, तो वह तुरन्त विषय बदल देती।
मानो आध्यात्मिकता उसके लिए आत्मदर्शन से अधिक आत्मरक्षा का तरीका हो।
अब उसकी उम्र उस पड़ाव पर है जहाँ लोग बाहर से अधिक सुलझे हुए दिखाई देने लगते हैं।
वह भी वैसी ही लगती है।
दुनिया की नज़र में एक समझदार, पढ़ी-लिखी, संवेदनशील, cultured स्त्री।
और यह बात ग़लत भी नहीं।
लेकिन मुझे हमेशा उसके भीतर एक और स्त्री महसूस हुई —
थोड़ी असुरक्षित,
थोड़ी आत्ममुग्ध,
थोड़ी अकेली,
और अपने ही बनाए हुए व्यक्तित्व से पूरी तरह बाहर न निकल पाने वाली।
कुल मिलाकर वह मुझे हमेशा औसत से ऊपर की, लेकिन स्वयं में उलझी हुई स्त्री लगी।
ऐसी स्त्री, जो जीवन को समझना चाहती थी —
पर हर बार स्वयं को पूरी तरह समझ लेने से थोड़ा पहले रुक जाती थी।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment