दूसरा आकाश
दूसरा आकाश
हर मनुष्य के भीतर
एक दूसरा आकाश होता है।
बाहर वाले से बड़ा।
ज़्यादा जटिल।
ज़्यादा अकेला।
वहीं कहीं
प्रेम अपने घोंसले बनाता है।
कभी किसी स्मृति के पेड़ पर।
कभी किसी प्रतीक्षा के तार पर।
कभी किसी असंभव इच्छा की चट्टान पर।
लोग समझते हैं
प्रेम दो लोगों के बीच होता है।
असल में
प्रेम पहले
मनुष्य और उसके भीतर के आकाश के बीच होता है।
दूसरा व्यक्ति
बस एक पक्षी होता है
जो वहाँ आकर
कुछ देर बैठ जाता है।
मुकेश ,,,,,,
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