कई नाम बचाकर रखे थे।
मैंने उसके लिए
कई नाम बचाकर रखे थे।
कुछ फूलों से चुराए,
कुछ बादलों से,
कुछ उन रातों से
जिनमें नींद नहीं आई।
पर जब भी उसे पुकारना चाहा,
वह मेरे सामने
सिर्फ़ एक मुस्कान रख देती।
नाम सारे बेकार हो गए।
कुछ लोग
किसी संबोधन में नहीं समाते।
मुकेश ,,,,,,,,,
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