प्रेम की तरह नहीं आई थी।
वह मेरे जीवन में
प्रेम की तरह नहीं आई थी।
वह एक प्रश्न की तरह आई थी।
धीरे-धीरे
मेरी सारी निश्चितताएँ
उसके चारों ओर टूटती गईं।
मैं उत्तर खोजता रहा,
और वह
हर बार नया प्रश्न बन गई।
आज भी
जब उसकी याद आती है,
मुझे कोई चेहरा नहीं दिखता
बस एक खुला हुआ प्रश्नचिह्न
हवा में झूलता रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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