उसके जाने के बाद मैंने बहुत-सी नज़्में लिखीं।

 उसके जाने के बाद

मैंने बहुत-सी नज़्में लिखीं।

कुछ में उसका नाम नहीं था,

कुछ में उसका ज़िक्र नहीं था,

कुछ में प्रेम भी नहीं था।

फिर भी

हर नज़्म के अंत में

एक कुर्सी खाली रह जाती थी।

बहुत बाद में समझ आया

मैं उसे नहीं लिख रहा था,

मैं उस खाली कुर्सी को

शब्द दे रहा था।

मुकेश ,,,,,,,,,

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