यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नाभ्यं… — पृथ्वी सूक्त के द्वादश मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
“यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नाभ्यं…” — पृथ्वी सूक्त के द्वादश मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का द्वादश मंत्र सम्पूर्ण सूक्त के सर्वाधिक प्रसिद्ध और दार्शनिक मंत्रों में से एक है। विशेषतः “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” यह उद्घोष भारतीय सभ्यता के पर्यावरण-दर्शन का मूल सूत्र माना जाता है। यह केवल एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य और पृथ्वी के बीच संबंध की ऐसी घोषणा है जो आधुनिक पर्यावरण नैतिकता (Environmental Ethics), पारिस्थितिकी (Ecology) और सतत विकास (Sustainable Development) की मूल भावना से पूर्णतः सामंजस्य रखती है।
इस मंत्र में पृथ्वी को केवल भौतिक ग्रह नहीं माना गया है, बल्कि एक जीवंत, पोषणकारी और मातृस्वरूप सत्ता के रूप में देखा गया है। मनुष्य स्वयं को पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका पुत्र घोषित करता है। यही दृष्टि वैदिक चिंतन को आधुनिक पर्यावरणीय दर्शन से जोड़ती है।
मंत्र-पाठ
यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नाभ्यं ,यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवुः।तासु नो धेह्यभि नः पवस्व।माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु॥ १२॥
भावार्थ
हे पृथ्वी! तेरे मध्यभाग में, तेरी नाभि में तथा तेरे समस्त अंगों में जो जीवनदायिनी ऊर्जा विद्यमान है, वह हमें प्राप्त हो। तू हमें पवित्र कर। तू हमारी माता है और हम तेरे पुत्र हैं। पर्जन्य हमारे पिता हैं; वे भी हमारा पालन-पोषण करें।
पृथ्वी का “मध्य” और “नाभि” : भूगर्भीय संकेत
मंत्र का आरम्भ होता है— “यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नाभ्यम्”
यहाँ "मध्य" और "नाभि" दो अत्यन्त महत्वपूर्ण शब्द हैं।
वैदिक साहित्य में "नाभि" का अर्थ केवल शरीर का अंग नहीं है, बल्कि किसी व्यवस्था का केन्द्र (Centre) भी होता है।
वैज्ञानिक दृष्टि
आधुनिक भूविज्ञान के अनुसार पृथ्वी की आन्तरिक संरचना अनेक स्तरों में विभाजित है—
भू-पर्पटी (Crust)
मैंटल (Mantle)
बाह्य क्रोड (Outer Core)
आन्तरिक क्रोड (Inner Core)
पृथ्वी का आन्तरिक भाग ही—
भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy),
ज्वालामुखीय गतिविधियों,
प्लेट विवर्तनिकी,
चुम्बकीय क्षेत्र
का आधार है।
ऋषि जब पृथ्वी के "मध्य" और "नाभि" की बात करते हैं, तब वे पृथ्वी के भीतर स्थित उस जीवनदायी शक्ति की ओर संकेत करते हैं जो बाहर से दिखाई नहीं देती, किन्तु सम्पूर्ण पृथ्वी को सक्रिय रखती है।
“ऊर्जस्तन्वः” : पृथ्वी की ऊर्जा प्रणाली
मंत्र में कहा गया है— “यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवुः”
अर्थात् तेरे जिन अंगों में ऊर्जा विद्यमान है।
यहाँ "ऊर्जा" का उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
आधुनिक विज्ञान बताता है कि पृथ्वी अनेक प्रकार की ऊर्जाओं का स्रोत है—
सौर ऊर्जा का अवशोषण,
भू-तापीय ऊर्जा,
जैव-ऊर्जा,
जल-ऊर्जा,
पवन-ऊर्जा,
खनिज संसाधनों में संचित ऊर्जा।
ऋषि पृथ्वी को निष्क्रिय पदार्थ नहीं मानते; वे उसे ऊर्जा से परिपूर्ण जीवंत सत्ता के रूप में देखते हैं।
“तासु नो धेहि” : ऊर्जा का संतुलित उपयोग
ऋषि प्रार्थना करते हैं— “तासु नो धेहि”
अर्थात् उस ऊर्जा में हमारा भी सहभाग हो।
यहाँ वे सम्पूर्ण ऊर्जा अपने अधिकार में नहीं माँगते।
वे केवल उतनी ऊर्जा चाहते हैं जो जीवन के लिए आवश्यक हो।
यही वैदिक दृष्टि है—
प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलित सहभागिता।
आधुनिक Sustainable Resource Management भी यही सिखाता है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग संयमपूर्वक किया जाए।
“अभि नः पवस्व” : पर्यावरणीय शुद्धि
ऋषि आगे कहते हैं— “अभि नः पवस्व”
अर्थात् हमें पवित्र करो।
यह केवल आध्यात्मिक शुद्धि नहीं है।
वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी हमें शुद्ध करती है—
वृक्ष वायु को शुद्ध करते हैं,
मिट्टी जल को प्राकृतिक रूप से छानती है,
आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) प्रदूषण को कम करती हैं,
सूक्ष्मजीव जैविक अपशिष्टों का विघटन करते हैं।
आज इन्हें Natural Purification Systems कहा जाता है।
ऋषि इस प्राकृतिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया को एक आध्यात्मिक भाषा में व्यक्त करते हैं।
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” : वैदिक पर्यावरण-दर्शन का शिखर
यह मंत्र का सर्वाधिक प्रसिद्ध भाग है— “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
यह केवल एक धार्मिक उद्घोष नहीं है; यह मनुष्य और पृथ्वी के सम्बन्ध की दार्शनिक घोषणा है।
यदि पृथ्वी माता है तो—
उसका शोषण नहीं किया जा सकता,
उसका अपमान नहीं किया जा सकता,
उसका विनाश नहीं किया जा सकता।
पुत्र का धर्म केवल लेना नहीं, बल्कि माता की रक्षा करना भी है।
आधुनिक पर्यावरण नैतिकता
आज विश्वभर में Earth Ethics, Deep Ecology और Rights of Nature जैसे सिद्धान्त विकसित हो रहे हैं।
इनका मूल विचार है कि—
पृथ्वी केवल संसाधन नहीं, बल्कि सम्मान और संरक्षण की अधिकारी है।
यह वही भावना है जो वैदिक ऋषि हजारों वर्ष पूर्व व्यक्त कर चुके थे।
“पर्जन्यः पिता” : जलचक्र का वैदिक विज्ञान
मंत्र का अंतिम भाग है— “पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु।”
अर्थात् पर्जन्य (वर्षा) हमारे पिता हैं; वे हमारा पालन करें।
यहाँ पृथ्वी माता है और वर्षा पिता।
यह रूपक अत्यन्त वैज्ञानिक है।
जीवन के लिए दो प्रमुख तत्त्व आवश्यक हैं—
पृथ्वी (मिट्टी)
वर्षा (जल)
इन दोनों के संयोग से—
बीज अंकुरित होता है,
अन्न उत्पन्न होता है,
वनस्पति विकसित होती है,
जीवन चलता है।
आधुनिक कृषि विज्ञान भी यही सिद्ध करता है कि मिट्टी और जल का संतुलन ही कृषि और जीवन का आधार है।
पर्यावरणीय सन्देश
यह मंत्र आज के वैश्विक संकटों के संदर्भ में अत्यन्त प्रासंगिक है।
जब—
भूमि का क्षरण,
जलवायु परिवर्तन,
भूजल का ह्रास,
मृदा प्रदूषण,
मानवता के सामने चुनौती बन चुके हैं, तब यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि पृथ्वी हमारी माता है और वर्षा हमारे जीवन का आधार।
यदि हम माता का सम्मान नहीं करेंगे तो भविष्य की पीढ़ियों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।
वैज्ञानिक निष्कर्ष
इस मंत्र में आधुनिक विज्ञान के अनेक प्रमुख सिद्धान्तों की पूर्वपीठिका दिखाई देती है—
| वैदिक अवधारणा | आधुनिक वैज्ञानिक समानता |
|---|---|
| पृथ्वी का मध्य एवं नाभि | पृथ्वी की आन्तरिक संरचना (Geosphere) |
| ऊर्जस्तन्वः | ऊर्जा प्रणाली एवं प्राकृतिक संसाधन |
| पवस्व | प्राकृतिक शुद्धिकरण तंत्र |
| माता भूमिः | पर्यावरण नैतिकता (Environmental Ethics) |
| पर्जन्यः पिता | जलचक्र एवं कृषि-विज्ञान |
पृथ्वी सूक्त का द्वादश मंत्र वैदिक पर्यावरण-दर्शन का हृदय है। इसमें पृथ्वी को ऊर्जा से परिपूर्ण, जीवनदायिनी और मातृस्वरूप सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" केवल एक भावनात्मक वाक्य नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए एक नैतिक अनुबंध (Moral Covenant) है। यह मनुष्य को अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व का बोध कराता है।
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से यह मंत्र भूविज्ञान, ऊर्जा-विज्ञान, जलविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान और सतत विकास के सिद्धान्तों का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। यदि मानवता इस मंत्र की भावना को आत्मसात् कर ले, तो पर्यावरण संकटों का समाधान केवल तकनीक से नहीं, बल्कि चेतना के परिवर्तन से भी सम्भव हो सकता है।
समापन श्लोक
माता भूर्मे जीवनदाता, पर्जन्यो मे पितामहः।तयोः संरक्षणे नित्यं, मानवस्य परो धर्मः॥
(यह समापन श्लोक व्याख्यात्मक रचना है; यह मूल वैदिक मंत्र नहीं है।)
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