वह कभी मना भी नहीं करती थी,
वह कभी मना भी नहीं करती थी,
और हाँ भी नहीं कहती थी।
उसके पास
चुप्पियों की एक भाषा थी,
जिसे मैं बरसों पढ़ता रहा।
हर मुलाक़ात में
एक शब्द कम रह जाता,
हर विदाई में
एक अर्थ अधिक।
अब सोचता हूँ
शायद हम प्रेम में नहीं थे,
हम बस
एक-दूसरे की अधूरी व्याख्याएँ थे।
मुकेश ,,,,,,,,,
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