चिन्तन - ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड - भाग–12 : आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान और चेतना — मस्तिष्क, अनुभव और वैज्ञानिक अनुसंधान
ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड | अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन | फ़ाइल–010 | अध्याय–10 : चेतना क्या है? | भाग–12 : आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान और चेतना — मस्तिष्क, अनुभव और वैज्ञानिक अनुसंधान
भाग–12
: आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान और चेतना — मस्तिष्क, अनुभव और वैज्ञानिक अनुसंधान
(Modern Neuroscience and Consciousness: Brain,
Experience and Scientific Investigation)
यदि
प्राचीन और मध्यकालीन दर्शन ने चेतना को मुख्यतः आत्मा, मन, अनुभव और अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य
में समझने का प्रयास किया, तो आधुनिक विज्ञान ने इस प्रश्न को एक नई दिशा प्रदान की।
पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्षों में जीवविज्ञान (Biology), तंत्रिका-विज्ञान
(Neuroscience), मनोविज्ञान (Psychology), संज्ञान-विज्ञान (Cognitive Science), कम्प्यूटर
विज्ञान (Computer Science) और चिकित्सा-विज्ञान (Medicine) के विकास ने चेतना के अध्ययन
को प्रयोगात्मक (Experimental) आधार प्रदान किया।
आज
वैज्ञानिक चेतना का अध्ययन केवल दार्शनिक चिन्तन द्वारा नहीं, बल्कि मस्तिष्क की संरचना,
तंत्रिका-कोशिकाओं (Neurons), विद्युत गतिविधियों (Electrical Activity), मस्तिष्क-चित्रण
(Brain Imaging), व्यवहार-अध्ययन तथा संगणकीय प्रतिरूपों (Computational Models) के
माध्यम से भी करते हैं।
फिर भी, वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद चेतना आज भी विज्ञान के सबसे जटिल और अपूर्ण रूप से समझे गए विषयों में से एक बनी हुई है।
विज्ञान चेतना का अध्ययन कैसे करता है?
आधुनिक
विज्ञान किसी भी घटना का अध्ययन प्रेक्षण (Observation), प्रयोग (Experiment), मापन
(Measurement) और पुनरुत्पादन (Replication) के माध्यम से करता है।
इसी
कारण विज्ञान चेतना का प्रत्यक्ष अध्ययन नहीं करता, क्योंकि किसी व्यक्ति के व्यक्तिनिष्ठ
अनुभव (Subjective Experience) को बाहरी उपकरण से सीधे नहीं देखा जा सकता।
इसके
स्थान पर विज्ञान उन प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है जो चेतन अनुभव के साथ सहसम्बद्ध
(Correlated) दिखाई देती हैं।
उदाहरण
के लिए—
- मस्तिष्क
के कौन-से भाग जागरूक अनुभव के समय सक्रिय होते हैं?
- नींद,
स्वप्न, संज्ञाहरण (Anaesthesia) और कोमा के दौरान मस्तिष्क की गतिविधि कैसे बदलती
है?
- निर्णय
लेने से पहले मस्तिष्क में कौन-सी तंत्रिका प्रक्रियाएँ घटित होती हैं?
- ध्यान
(Attention), स्मृति (Memory) और आत्मबोध (Self-awareness) का तंत्रिका-आधार क्या
है?
इन
प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान का प्रमुख कार्यक्षेत्र
है।
न्यूरल कॉरिलेट्स ऑफ कॉन्शसनेस (Neural Correlates of Consciousness)
समकालीन
चेतना-अध्ययन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है—
न्यूरल
कॉरिलेट्स ऑफ कॉन्शसनेस (Neural Correlates of Consciousness – NCC)।
इसका
आशय उन न्यूरल प्रक्रियाओं या मस्तिष्कीय गतिविधियों से है जो किसी विशेष चेतन अनुभव
के साथ नियमित रूप से जुड़ी होती हैं।
उदाहरण
के लिए—
यदि
कोई व्यक्ति लाल रंग देखता है, संगीत सुनता है या पीड़ा का अनुभव करता है, तो मस्तिष्क
के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में गतिविधि देखी जा सकती है।
इन
गतिविधियों और अनुभवों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना NCC अनुसंधान का उद्देश्य है।
किन्तु
यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक सावधानी आवश्यक है।
सहसम्बन्ध
(Correlation) कारण (Causation) का प्रमाण नहीं होता।
यदि
किसी चेतन अनुभव के साथ कोई मस्तिष्कीय गतिविधि जुड़ी हुई दिखाई देती है, तो इससे यह
स्वतः सिद्ध नहीं होता कि वही गतिविधि चेतना की अंतिम उत्पत्ति है।
यही
बिन्दु आधुनिक विज्ञान और दर्शन के बीच निरन्तर संवाद का विषय बना हुआ है।
मस्तिष्क की संरचना और चेतना
मानव
मस्तिष्क लगभग 86 अरब तंत्रिका-कोशिकाओं (Neurons) और उनके बीच खरबों सिनैप्टिक
(Synaptic) सम्बन्धों से निर्मित एक अत्यन्त जटिल जैविक प्रणाली है।
इन
न्यूरॉनों के मध्य निरन्तर विद्युत और रासायनिक संकेतों का आदान-प्रदान होता रहता है।
आधुनिक
अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ है कि—
- चेतन
अनुभव किसी एक बिन्दु पर उत्पन्न नहीं होता।
- मस्तिष्क
के अनेक क्षेत्र परस्पर सहयोग करते हैं।
- ध्यान,
स्मृति, भाषा, संवेदना और निर्णय जैसी प्रक्रियाएँ विस्तृत तंत्रिका-जालों
(Distributed Neural Networks) में सम्पन्न होती हैं।
इस
कारण आज अधिकांश तंत्रिका-विज्ञानी चेतना को किसी एक "चेतना केन्द्र"
(Consciousness Centre) की बजाय एक जटिल नेटवर्क-आधारित प्रक्रिया के रूप में देखते
हैं।
मस्तिष्क-चित्रण तकनीकें
चेतना
के अध्ययन में अनेक आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जैसे—
- कार्यात्मक
चुम्बकीय अनुनाद इमेजिंग (Functional Magnetic Resonance Imaging – fMRI)
- विद्युत-मस्तिष्कलेखन
(Electroencephalography – EEG)
- चुम्बकीय-मस्तिष्कलेखन
(Magnetoencephalography – MEG)
- पॉज़िट्रॉन
उत्सर्जन टोमोग्राफी (Positron Emission Tomography – PET)
इन
तकनीकों के माध्यम से वैज्ञानिक यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न चेतन अवस्थाओं—जाग्रत
अवस्था, स्वप्न, गहरी निद्रा, ध्यान, संज्ञाहरण तथा कोमा—के दौरान मस्तिष्क में क्या
परिवर्तन होते हैं।
इनसे
चेतना की तंत्रिका-सहसम्बद्ध प्रक्रियाओं की जानकारी तो प्राप्त होती है, किन्तु चेतना
के व्यक्तिनिष्ठ अनुभव का प्रत्यक्ष मापन अभी भी सम्भव नहीं है।
चेतना की परिवर्तित अवस्थाएँ
आधुनिक
विज्ञान अब केवल सामान्य जाग्रत अवस्था का ही अध्ययन नहीं करता।
वह
चेतना की विभिन्न अवस्थाओं का भी परीक्षण करता है, जैसे—
- जाग्रत
अवस्था (Wakefulness)
- स्वप्न
(Dreaming)
- गहरी
निद्रा (Deep Sleep)
- संज्ञाहरण
(Anaesthesia)
- कोमा
(Coma)
- न्यूनतम
चेतन अवस्था (Minimally Conscious State)
- ध्यान
(Meditative States)
इन
अवस्थाओं के अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि चेतना एक समान अवस्था नहीं
है, बल्कि उसके अनेक स्तर और रूप हो सकते हैं।
यहाँ
भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी विशेष मस्तिष्कीय अवस्था का सम्बन्ध किसी विशेष
अनुभव से अवश्य हो सकता है, किन्तु अनुभव की गुणात्मक प्रकृति (Qualitative
Nature) का प्रश्न अभी भी खुला हुआ है।
क्या मस्तिष्क ही चेतना उत्पन्न करता है?
आधुनिक
विज्ञान के भीतर इस प्रश्न पर पूर्ण सहमति नहीं है।
कई
वैज्ञानिक और दार्शनिक यह मानते हैं कि चेतना मस्तिष्क की जटिल जैविक प्रक्रियाओं का
उद्भूत गुण (Emergent Property) है।
कुछ
अन्य इसे सूचना-प्रसंस्करण (Information Processing) की विशेष अवस्था से जोड़ते हैं।
कुछ
विचारक यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या वर्तमान वैज्ञानिक प्रतिमान चेतना की पूर्ण
व्याख्या करने के लिए पर्याप्त है।
यहाँ
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मुख्यधारा का तंत्रिका-विज्ञान सामान्यतः मस्तिष्क को
चेतन अनुभव के लिए अनिवार्य मानता है, किन्तु चेतना की अंतिम प्रकृति (Ultimate
Nature of Consciousness) पर अभी भी कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक सिद्धान्त उपलब्ध नहीं
है।
विज्ञान की उपलब्धियाँ
आधुनिक
विज्ञान ने चेतना-अध्ययन में अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं।
उदाहरणार्थ—
- मस्तिष्क
की कार्यप्रणाली का अभूतपूर्व ज्ञान।
- न्यूरोलॉजिकल
विकारों की बेहतर समझ।
- संज्ञाहरण
की वैज्ञानिक व्याख्या।
- कोमा
और चेतना-विकारों का उन्नत निदान।
- ध्यान
एवं मानसिक प्रशिक्षण के मस्तिष्क पर प्रभावों का अध्ययन।
- मस्तिष्क–कम्प्यूटर
अन्तरफलक (Brain–Computer Interface) जैसे नए अनुसंधान।
इन
उपलब्धियों ने चिकित्सा, मनोविज्ञान और तंत्रिका-विज्ञान को नई दिशा प्रदान की है।
विज्ञान की सीमाएँ
इन
सफलताओं के बावजूद कुछ मूल प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं—
- व्यक्तिनिष्ठ
अनुभव (Subjective Experience) कैसे उत्पन्न होता है?
- "लाल"
रंग लाल जैसा क्यों अनुभव होता है?
- पीड़ा
केवल तंत्रिका-संकेत न होकर अनुभव क्यों बनती है?
- आत्मबोध
(Sense of Self) का अंतिम आधार क्या है?
- क्या
चेतना को केवल भौतिक प्रक्रियाओं से पूर्णतः समझाया जा सकता है?
ये
प्रश्न विज्ञान के लिए अभी भी खुले हुए हैं।
यही
कारण है कि चेतना का अध्ययन आज भी दर्शन, तंत्रिका-विज्ञान, मनोविज्ञान और संज्ञान-विज्ञान
के बीच एक साझा अनुसन्धान का विषय बना हुआ है।
दार्शनिक समीक्षा
आधुनिक
तंत्रिका-विज्ञान ने चेतना के अध्ययन को अभूतपूर्व अनुभवजन्य (Empirical) आधार प्रदान
किया है।
उसने
यह स्पष्ट किया है कि मस्तिष्क और चेतन अनुभव के बीच गहरा सम्बन्ध है।
किन्तु
इस सम्बन्ध की प्रकृति क्या है—यह प्रश्न अभी भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है।
इसलिए
यह कहना कि विज्ञान ने चेतना की समस्या का अंतिम समाधान खोज लिया है, तथ्यात्मक रूप
से उचित नहीं होगा।
उसी
प्रकार यह कहना भी उचित नहीं होगा कि विज्ञान इस दिशा में कोई महत्त्वपूर्ण योगदान
नहीं दे पाया।
सत्य
इन दोनों अतियों के बीच स्थित है।
आगे
की दिशा
अब
तक हमने चेतना के दार्शनिक और तंत्रिका-वैज्ञानिक अध्ययन को समझा।
किन्तु
इन दोनों के बीच एक नया क्षेत्र विकसित हुआ है, जहाँ वैज्ञानिक और दार्शनिक चेतना की
व्याख्या के लिए विभिन्न सैद्धान्तिक प्रतिमानों (Theoretical Models) का निर्माण कर
रहे हैं।
इन्हीं
में Hard Problem of Consciousness, Qualia, Global Workspace
Theory, Integrated Information Theory (IIT), Higher-Order
Theories, Predictive Processing, Panpsychism तथा अन्य समकालीन
सिद्धान्त विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
मुकेश श्रीवास्तव ,,,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )
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