चिन्तन - अध्याय–13 | भाग–6- कर्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
अध्याय–13 | भाग–6- कर्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
उपनिषदों में कर्मफल का दार्शनिक विकास
मुख्य प्रश्न (Central Question)
क्या उपनिषदों में कर्मफल का सिद्धान्त पहली बार स्पष्ट दार्शनिक रूप प्राप्त करता है? यदि हाँ, तो उसका आधार क्या है—नैतिक न्याय (Moral Justice), कारणता (Causation), आत्मा (Ātman), पुनर्जन्म (Rebirth), अथवा चेतना का विकास (Evolution of
Consciousness)? क्या
उपनिषद प्रत्येक कर्म के निश्चित फल का प्रतिपादन करते हैं, या वे कर्मफल को आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा के व्यापक सन्दर्भ में देखते हैं?
मुख्य विश्लेषण (Main Analysis)
यदि वेदों में
ऋत सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था का आधार है,
तो उपनिषदों में वही विमर्श
एक नए प्रश्न की
ओर मुड़ता है—
"इस व्यवस्था के भीतर मनुष्य कौन है?"
यहीं से भारतीय
दर्शन का केन्द्र बाह्य
जगत से अन्तर्जगत की
ओर स्थानान्तरित होता है।
उपनिषदों का प्रमुख उद्देश्य
कर्मफल का कोई पृथक्
सिद्धान्त स्थापित करना नहीं था।
उनका मूल प्रश्न था—आत्मा क्या है? ब्रह्म क्या है? मनुष्य का वास्तविक स्वरूप क्या है? किन्तु जब ये प्रश्न
उठे, तब स्वाभाविक रूप
से यह प्रश्न भी
सामने आया कि यदि
आत्मा शरीर से भिन्न
है और जीवन केवल
एक जन्म तक सीमित
नहीं है, तो मनुष्य
के कर्मों का क्या होता
है?
यहीं से कर्म
और कर्मफल का सम्बन्ध एक
नए दार्शनिक आयाम में प्रवेश
करता है।
अब कर्म केवल
सामाजिक या वैदिक अनुष्ठान
का विषय नहीं रह
जाता; वह आत्मा की
यात्रा (Journey of the
Self) से जुड़ जाता है।
वेद से उपनिषद : विचार का परिवर्तन
वैदिक साहित्य में प्रमुख प्रश्न
था— "विश्व किस व्यवस्था से संचालित होता है?"
उपनिषद पूछते हैं— "उस व्यवस्था का अनुभव करने वाला कौन है?"
यह परिवर्तन अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण है।
अब कर्म का
मूल्य केवल बाहरी परिणाम
से नहीं आँका जाता;
उसका सम्बन्ध उस चेतना से
स्थापित होता है जो
कर्म करती है और
उसके प्रभावों को ग्रहण करती
है।
इस प्रकार कर्मफल
की अवधारणा पहली बार केवल
बाह्य परिणाम (External
Consequence) से आगे बढ़कर आन्तरिक
परिणाम (Inner
Consequence) का भी विषय बनती
है।
कर्म और आत्मा का सम्बन्ध
उपनिषदों का एक मूल
प्रतिपादन यह है कि
मनुष्य केवल शरीर नहीं
है। शरीर परिवर्तनशील है। मन परिवर्तनशील है। इन्द्रियाँ परिवर्तनशील हैं।
किन्तु इनके पीछे एक
ऐसा तत्त्व है जो परिवर्तन
का साक्षी है।
उसे ही विभिन्न
उपनिषदों में आत्मा (Ātman) कहा गया है।
जब आत्मा की
यह अवधारणा स्वीकार की जाती है,
तब कर्म का प्रश्न
भी बदल जाता है।
अब प्रश्न केवल
यह नहीं रह जाता
कि— "मैंने क्या किया?"
बल्कि यह भी बन
जाता है— "मेरे कर्म मेरी चेतना को किस दिशा में ले जा रहे हैं?"
यहीं कर्मफल का
आध्यात्मिक आयाम प्रारम्भ होता
है।
बृहदारण्यक उपनिषद में एक अत्यन्त
प्रसिद्ध विचार मिलता है— "यथाकारी यथाचारी तथा भवति।"
अर्थात्— "मनुष्य जैसा कर्म करता है, जैसा आचरण करता है, वैसा ही बनता जाता है।"
यहाँ ध्यान देने
योग्य बात यह है
कि उपनिषद केवल यह नहीं
कह रहा कि मनुष्य
को वैसा फल मिलेगा।
वह कह रहा
है— मनुष्य स्वयं वैसा बन जाता है। यह अत्यन्त गहरा
दार्शनिक परिवर्तन है।यहाँ कर्मफल बाहरी पुरस्कार नहीं,बल्कि व्यक्तित्व
का निर्माण (Formation of
Character) बन जाता है।
अर्थात्— कर्म का पहला
फल संसार में नहीं, स्वयं
कर्ता के भीतर उत्पन्न
होता है।
छान्दोग्य उपनिषद में कर्म, ज्ञान
और पुनर्जन्म के सम्बन्ध पर
विचार मिलता है। वहाँ यह संकेत मिलता
है कि मनुष्य का
जीवन उसके ज्ञान, कर्म
और आचरण से सम्बद्ध
है।
किन्तु यहाँ भी कर्मफल
को किसी यांत्रिक नियम
(Mechanical Law) की तरह प्रस्तुत नहीं
किया गया।
बल्कि यह कहा गया
कि मनुष्य का अन्तःकरण, उसकी
प्रवृत्तियाँ और उसका जीवन-पथ उसके कर्मों
से निर्मित होता है।
इस प्रकार कर्मफल
केवल बाहरी घटना नहीं, बल्कि
अस्तित्वगत दिशा (Existential Direction)
बन जाता है।
कठोपनिषद का केन्द्र मृत्यु
और आत्मा है।
यद्यपि इसका मुख्य विषय
कर्मफल नहीं है, फिर
भी यह एक अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—
यदि आत्मा अविनाशी
है,तो कर्म किसे
प्रभावित करते हैं?
यहीं उपनिषद यह
संकेत देता है कि
अज्ञान (Avidyā), इच्छा (Kāma) और कर्म (Karma) परस्पर
सम्बद्ध हैं।
जब तक मनुष्य
स्वयं को केवल सीमित
अहंकार के रूप में
देखता है,तब तक
कर्मों का बन्धन बना
रहता है।
ज्ञान (Vidyā) इस बन्धन की
प्रकृति को बदल देता
है।
यह विचार आगे
चलकर वेदान्त में अत्यन्त विकसित
होता है।
मुण्डक उपनिषद कर्म की महत्ता
स्वीकार करता है, किन्तु
उसकी सीमा भी स्पष्ट
करता है।
वह कहता है
कि वैदिक कर्म और यज्ञ
उपयोगी हैं,परन्तु वे
अन्तिम सत्य की प्राप्ति
के लिए पर्याप्त नहीं।
ज्ञान के बिना कर्म
मनुष्य को सीमित क्षेत्र
में ही रखता है।
यहाँ पहली बार
कर्मफल की अवधारणा पर
एक सूक्ष्म आलोचनात्मक दृष्टि दिखाई देती है।
अर्थात्— कर्म आवश्यक हैं,
किन्तु केवल कर्म ही
पर्याप्त नहीं।
ज्ञान के बिना कर्म
का फल सीमित रहता
है।
उपनिषदों का सबसे बड़ा
योगदान यह है कि
उन्होंने कर्मफल को बाहरी पुरस्कार
और दण्ड की संकीर्ण
अवधारणा से ऊपर उठाया।
उनकी दृष्टि में—
प्रत्येक कर्म → एक संस्कार उत्पन्न करता है → संस्कार → व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं → व्यक्तित्व → निर्णयों को प्रभावित करता है → निर्णय → नए कर्म उत्पन्न करते हैं।
इस प्रकार कर्मफल
केवल भविष्य में मिलने वाली
घटना नहीं,बल्कि वर्तमान
में चल रही चेतना
की निरन्तर प्रक्रिया है।
यह दृष्टि आधुनिक
मनोविज्ञान में Habit Formation, Character
Development तथा Behavioural
Conditioning जैसे विचारों के साथ संवाद
स्थापित कर सकती है,
यद्यपि दोनों की पद्धति और
दार्शनिक आधार अलग-अलग
हैं।
इस अध्ययन से
कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आते हैं—
प्रथम, उपनिषदों में कर्मफल पहली
बार आत्मा और चेतना के
सन्दर्भ में व्यवस्थित दार्शनिक
अर्थ ग्रहण करता है।
द्वितीय, कर्म का प्रथम
प्रभाव बाहरी संसार पर नहीं, बल्कि
स्वयं कर्ता के अन्तःकरण पर
पड़ता है।
तृतीय, कर्म केवल घटना
उत्पन्न नहीं करता; वह
व्यक्तित्व, संस्कार और जीवन-दृष्टि
का निर्माण भी करता है।
चतुर्थ, ज्ञान और कर्म के
सम्बन्ध को पहली बार
गहराई से समझाया जाता
है।
पंचम, कर्मफल को केवल पुरस्कार
और दण्ड के रूप
में नहीं, बल्कि आत्मिक विकास अथवा बन्धन की
प्रक्रिया के रूप में
भी देखा जाता है।
- क्या
उपनिषद कर्मफल को नैतिक नियम मानते हैं, या आध्यात्मिक नियम?
- क्या
ज्ञान कर्मफल को समाप्त करता है, या केवल उसके अनुभव की प्रकृति बदल देता है?
- क्या
आत्मा कर्मफल का भोक्ता है, या केवल साक्षी?
- क्या
कर्म और पुनर्जन्म का सम्बन्ध सभी उपनिषदों में समान रूप से प्रतिपादित है?
समकालीन उपनिषद-अध्ययन में यह सामान्यतः
स्वीकार किया जाता है
कि उपनिषदों ने वैदिक ऋत
की अवधारणा को आत्मा, चेतना
और पुनर्जन्म के साथ जोड़कर
कर्म-विचार को एक नया
दार्शनिक आयाम प्रदान किया।
तथापि सभी उपनिषद एक
समान मत प्रस्तुत नहीं
करते। कुछ में ज्ञान
(Vidyā) पर अधिक बल है,
कुछ में कर्म और
उपासना पर, जबकि कुछ
में आत्मविद्या को कर्म से
परे अंतिम साध्य के रूप में
प्रस्तुत किया गया है।
इसलिए उपनिषदों को एकरूप ग्रन्थ
न मानकर विविध दार्शनिक स्वरों के संग्रह के
रूप में पढ़ना अधिक
उपयुक्त माना जाता है।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न (Unanswered
Questions)
- यदि
आत्मा अपरिवर्तनीय है, तो कर्म के संस्कार किस स्तर पर स्थित होते हैं?
- क्या
कर्मफल आत्मा का गुण है, या सूक्ष्म व्यक्तित्व (Subtle
Personality) का?
- क्या
ज्ञान प्राप्त होने के बाद भी पूर्वकृत कर्मों के परिणाम बने रहते हैं?
- क्या
उपनिषदों का कर्मफल-सिद्धान्त नैतिक है, आध्यात्मिक है, या दोनों का समन्वय?
उपनिषदों में कर्मफल का
विचार पहली बार अपनी
पूर्ण दार्शनिक गहराई प्राप्त करता है। यहाँ
कर्म केवल बाहरी क्रिया
नहीं, बल्कि चेतना का रूपान्तरण है;
और कर्मफल केवल भविष्य की
घटना नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य के व्यक्तित्व, संस्कार
और आध्यात्मिक दिशा का निर्माण
करने वाली सतत प्रक्रिया
है। यदि वेदों ने
मनुष्य को विश्व-व्यवस्था (ऋत) से जोड़ा, तो
उपनिषदों ने उसे स्वयं
अपने अन्तःस्वरूप से जोड़ते हुए
यह संकेत दिया कि कर्म
का सबसे गहरा फल
बाहर नहीं, भीतर प्रकट होता
है।
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
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