चिंतन -अध्याय–13 | भाग–7.3 - र्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
चिंतन -अध्याय–13 | भाग–7.3 - र्मफल — परिणाम, प्रारब्ध और भाग्य का दार्शनिक अध्ययन
फलासक्ति, निष्काम कर्म और त्याग : कर्मफल के प्रति मनुष्य का सम्बन्ध
मुख्य प्रश्न (Central Question)
क्या फल की इच्छा और फलासक्ति एक ही बात हैं? क्या निष्काम कर्म का अर्थ सभी इच्छाओं का पूर्ण अभाव है? और गीता जिस "त्याग" की बात करती है, क्या वह कर्म का त्याग है या कर्मफल के प्रति मानसिक स्वामित्व और आसक्ति का?
मुख्य विश्लेषण (Main Analysis)
कर्मफल पर विचार करते
समय एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
भ्रम बार-बार सामने
आता है।
मनुष्य प्रायः इन सभी को
एक ही मान लेता
है— फल की इच्छा ,फल की अपेक्षा, फलासक्ति, फल के प्रति मोह
किन्तु दार्शनिक दृष्टि से ये चारों
एक ही मानसिक अवस्थाएँ
नहीं हैं।
यदि इनका भेद
स्पष्ट न किया जाए,
तो निष्काम कर्म (Niṣkāma Karma) का अर्थ भी
गलत समझा जाएगा और
गीता का कर्मफल-सिद्धान्त
भी।
इच्छा और फलासक्ति का भेद
किसी व्यक्ति का
लक्ष्य होना स्वाभाविक है।
एक विद्यार्थी परीक्षा में सफल होना
चाहता है। एक चिकित्सक रोगी को स्वस्थ
देखना चाहता है। एक लेखक चाहता है
कि उसकी रचना पाठकों
तक पहुँचे।एक किसान चाहता है कि उसकी
फसल अच्छी हो।
क्या ये सभी
इच्छाएँ गलत हैं?
गीता का उत्तर
ऐसा नहीं है।इच्छा (Desire) स्वयं में समस्या नहीं
है।समस्या तब उत्पन्न होती
है जब इच्छा—
मनुष्य की सम्पूर्ण मानसिक पहचान का केन्द्र बन जाती है।तब व्यक्ति कहता
है—"यदि यह फल नहीं मिला, तो मैं असफल हूँ।" यहीं से फलासक्ति
प्रारम्भ होती है।
फलासक्ति क्या है?
फलासक्ति का अर्थ केवल
फल की इच्छा नहीं
है।
फलासक्ति का अर्थ है—
फल के साथ अपनी मानसिक शान्ति, आत्म-मूल्य और अस्तित्व-बोध को बाँध देना।
इसे एक सरल
क्रम में समझा जा
सकता है— कर्म → फल की अपेक्षा → फल से पहचान → फल पर मानसिक निर्भरता → फलासक्ति
अर्थात् — फलासक्ति का मूल फल नहीं, फल के साथ मनुष्य का सम्बन्ध है। फल के साथ मनुष्य का सम्बन्ध है।
निष्काम कर्म का वास्तविक अर्थ
"निष्काम" शब्द को सामान्यतः
इस प्रकार समझा जाता है—
"जिसमें
कोई इच्छा न हो।"
किन्तु यदि इसका यही
अर्थ लिया जाए, तो
निष्काम कर्म लगभग असम्भव
हो जाएगा।
क्योंकि मनुष्य का प्रत्येक कर्म
किसी न किसी प्रेरणा
से उत्पन्न होता है।
भूख भोजन की
ओर ले जाती है।
ज्ञान की जिज्ञासा अध्ययन की ओर ले
जाती है। करुणा सेवा की ओर
ले जाती है।कर्तव्य-बोध
कर्म की ओर ले
जाता है।
अतः निष्काम कर्म
का अर्थ प्रेरणाहीन कर्म नहीं हो सकता।
अधिक उपयुक्त अर्थ
यह है— निष्काम कर्म वह कर्म है जिसमें फल की मानसिक दासता नहीं होती।
कर्म होता है।
उद्देश्य भी हो सकता
है। प्रयास भी पूर्ण हो
सकता है। किन्तु मनुष्य अपने अस्तित्व को
फल के हवाले नहीं
करता।
गीता में त्याग का प्रश्न
गीता के कर्मफल-विमर्श में त्याग (Renunciation) का विशेष महत्त्व
है।
किन्तु त्याग के दो रूपों
में भेद करना आवश्यक
है।
कर्मत्याग (Renunciation of
Action) - अर्थात्—
कर्म को ही छोड़ देना।
फलत्याग / फलासक्ति-त्याग (Renunciation of
Attachment to Results)
अर्थात्— कर्म करते हुए फल के प्रति स्वामित्व और आसक्ति का त्याग।
गीता का कर्मयोग
दूसरे प्रकार के त्याग की
ओर संकेत करता है।
यहाँ कर्म छोड़ा
नहीं जाता। - कर्म के भीतर उपस्थित अहंकारपूर्ण स्वामित्व-बोध को छोड़ा जाता है।
फल पर अधिकार क्यों नहीं?
अब प्रश्न उठता
है—
यदि मनुष्य कर्म
करता है, तो फल
पर उसका अधिकार क्यों
नहीं?
यहाँ "अधिकार" को समझने के
लिए कारणता (Causation) का प्रश्न देखना
होगा।
किसी भी परिणाम
का निर्माण प्रायः अनेक कारणों से
होता है।
उदाहरण के लिए— एक
विद्यार्थी परीक्षा में असफल हुआ।
क्या केवल उसकी
मेहनत ही परिणाम का
कारण थी?
संभव है— उसकी
तैयारी, परीक्षा का स्तर, स्वास्थ्य,
मानसिक तनाव,समय-प्रबन्धन,
प्रश्नपत्र, और परिस्थितियाँ
सभी ने परिणाम
को प्रभावित किया हो।
इसलिए किसी एक व्यक्ति
द्वारा किया गया कर्म
और अन्तिम परिणाम के बीच सीधी,
पूर्ण और एकमात्र कारणता मान लेना दार्शनिक
रूप से सरलतावादी दृष्टिकोण
है।
गीता का फलासक्ति-विमर्श इसी मानवीय भ्रम
को चुनौती देता है।
क्या फल की अपेक्षा गलत है?
यहाँ एक अत्यन्त
सूक्ष्म भेद है। अपेक्षा (Expectation)
"मैंने यह कर्म किया
है; सम्भवतः इसका यह परिणाम
हो सकता है।"
आसक्ति (Attachment) - "यह परिणाम अवश्य
होना चाहिए। यदि नहीं हुआ,
तो मैं टूट जाऊँगा।"
पहली स्थिति व्यवहारिक
है। दूसरी मानसिक बन्धन की स्थिति है।
इसीलिए कर्मफल के अध्ययन में
यह कहना कि— "गीता फल
की इच्छा का निषेध करती है"
अत्यधिक सरलीकरण होगा। अधिक सटीक कथन यह
होगा—
गीता फल को मनुष्य की आन्तरिक स्वतंत्रता का स्वामी बनने से रोकती है।
निष्काम कर्म और आधुनिक मनोविज्ञान
आधुनिक मनोविज्ञान में Intrinsic Motivation
(आन्तरिक प्रेरणा) और Extrinsic Motivation (बाहरी प्रेरणा) के बीच भेद
किया जाता है।
यदि व्यक्ति केवल
पुरस्कार, प्रशंसा या दण्ड से
प्रेरित है, तो उसका
व्यवहार बाहरी परिणाम पर अधिक निर्भर
रहता है।
इसके विपरीत, यदि
व्यक्ति कार्य के अर्थ, मूल्य
या आन्तरिक संतोष से प्रेरित है,
तो उसकी प्रेरणा अधिक
स्वायत्त हो सकती है।
गीता का निष्काम
कर्म आधुनिक मनोविज्ञान के इन सिद्धान्तों
के समान नहीं है।
फिर भी दोनों
के बीच एक सीमित
संवाद सम्भव है।
दोनों यह प्रश्न उठाते
हैं— क्या मनुष्य का कर्म केवल बाहरी परिणाम से संचालित होना चाहिए?
यहीं गीता का
दार्शनिक प्रश्न आधुनिक मनोवैज्ञानिक प्रश्न से मिलता है।
निष्काम कर्म और उत्कृष्टता
एक सामान्य आपत्ति
यह है— यदि फल की आसक्ति न हो, तो मनुष्य उत्कृष्ट कर्म क्यों करेगा?
यह आपत्ति महत्त्वपूर्ण
है। क्योंकि आधुनिक जीवन में प्रतियोगिता,
लक्ष्य और उपलब्धि अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण हैं।
किन्तु गीता का उत्तर
सम्भवतः यह होगा— उत्कृष्टता
का आधार भय और आसक्ति नहीं, कर्म की पूर्णता हो सकती है।
एक कलाकार यदि
केवल पुरस्कार के लिए चित्र
बनाए,तो उसका ध्यान
पुरस्कार पर अधिक हो
सकता है।
किन्तु यदि उसका ध्यान
रचना की पूर्णता पर
हो,तो उसका कर्म
अधिक गहरा हो सकता
है।
यहाँ निष्काम कर्म
उत्कृष्टता का विरोध नहीं करता।
वह उत्कृष्टता की
प्रेरणा को बाहरी पुरस्कार
से हटाकर कर्म की आन्तरिक
गुणवत्ता की ओर ले
जाने का प्रयास करता
है।
कर्मफल के साथ मनुष्य
का सम्बन्ध प्रायः अहंकार से जुड़ जाता
है।
सफलता मिली— "मैंने किया।"
असफलता मिली— "मैं असफल हूँ।"
दोनों ही स्थितियों में
व्यक्ति स्वयं को परिणाम से
जोड़ लेता है। गीता इस
पहचान को चुनौती देती
है।
यहाँ प्रश्न यह
नहीं है कि मनुष्य
कर्म का कर्ता है
या नहीं।
बल्कि प्रश्न है— क्या वह स्वयं को केवल अपने कर्मफल से परिभाषित करेगा?
यही प्रश्न आगे
गीता के त्याग और कर्तृत्व के व्यापक विमर्श
से जुड़ता है।
कर्मफल के सन्दर्भ में गीता का मूल सूत्र
अब तक के
विश्लेषण से गीता का
कर्मफल-विचार इस प्रकार संक्षेपित
किया जा सकता है—
फल
को नकारो मत। फल पर पूर्ण नियंत्रण का भ्रम मत रखो।फल को कर्म का एकमात्र हेतु मत बनाओ।
फल के कारण कर्म से भागो मत।और अपने अस्तित्व को फल के साथ बाँधो मत।
यह कर्मफल का
एक अत्यन्त परिपक्व मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण
है।
- क्या
फल की इच्छा और फलासक्ति का भेद व्यवहार में सम्भव है?
- क्या
निष्काम कर्म वास्तव में मनुष्य की प्राकृतिक इच्छाओं के विरुद्ध है?
- क्या
फलासक्ति-त्याग से कर्म की प्रेरणा कम हो सकती है?
- क्या
गीता का त्याग केवल मानसिक है या आध्यात्मिक भी?
- क्या
मनुष्य अपने आत्म-मूल्य को परिणाम से पूर्णतः अलग कर सकता है?
समकालीन गीता-अध्ययन में
निष्काम कर्म को प्रायः
इच्छा-शून्यता के रूप में
नहीं, बल्कि फल-आसक्ति से स्वतंत्र कर्म के रूप में
पुनर्पाठित किया जाता है।
आधुनिक मनोविज्ञान और नैतिक दर्शन
में भी परिणाम-निर्भर
आत्म-मूल्य, बाहरी प्रेरणा और आन्तरिक स्वायत्तता
पर व्यापक शोध हुआ है।
फिर भी गीता का
निष्काम कर्म किसी आधुनिक
मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त का प्राचीन संस्करण
नहीं है। उसका अंतिम
उद्देश्य आत्मिक स्वतंत्रता और कर्मयोग है,
जबकि आधुनिक अध्ययन प्रायः व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य
पर केन्द्रित रहते हैं।
- क्या
फलासक्ति का पूर्ण त्याग मनुष्य के लिए सम्भव है?
- क्या
इच्छा के बिना कर्म सम्भव है?
- क्या
निष्काम कर्म एक अवस्था है या निरन्तर साधना?
- यदि
कर्मफल मनुष्य के पूर्ण नियंत्रण में नहीं, तो उत्तरदायित्व की सीमा कहाँ तक है?
गीता के अनुसार
कर्मफल का प्रश्न केवल
यह नहीं है कि
कर्म का परिणाम क्या
होगा। उससे भी गहरा
प्रश्न यह है कि
मनुष्य परिणाम के साथ कैसा मानसिक सम्बन्ध स्थापित करता है। इच्छा जीवन की स्वाभाविक
शक्ति है; किन्तु जब
इच्छा फलासक्ति में बदल जाती
है, तब परिणाम मनुष्य
की चेतना पर अधिकार कर
लेता है। निष्काम कर्म
इस इच्छा का पूर्ण निषेध
नहीं, बल्कि उसके साथ मनुष्य
के सम्बन्ध का पुनर्गठन है।
इस दृष्टि से गीता कर्मफल
को बाहरी पुरस्कार-दण्ड की व्यवस्था
से आगे ले जाकर
मानसिक स्वतंत्रता और आत्मिक उत्तरदायित्व का प्रश्न बना
देती है।
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
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