चिन्तन -अध्याय–14 : नियति क्या है? भाग–3 : नियति, भाग्य, प्रारब्ध और निर्धारणवाद का भेद

 अध्याय–14 : नियति क्या है?

भाग–3 : नियति, भाग्य, प्रारब्ध और निर्धारणवाद का भेद

‘नियति’, ‘भाग्य’, ‘प्रारब्ध’ और ‘निर्धारणवाद’—ये चारों शब्द सामान्य जीवन में अनेक बार एक-दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं। कोई व्यक्ति कहता है, “यह मेरे भाग्य में था।” कोई कहता है, “यह मेरी नियति थी।” भारतीय दार्शनिक भाषा में कोई घटना ‘प्रारब्ध’ से जोड़ दी जाती है और आधुनिक बौद्धिक चर्चा में उसी प्रश्न को ‘निर्धारणवाद’ (Determinism) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सुनने में इन सभी शब्दों के भीतर एक समान भाव दिखाई देता है—मानो मनुष्य से परे कोई ऐसी व्यवस्था हो, जो उसके जीवन या घटनाओं की दिशा को प्रभावित करती है। लेकिन दार्शनिक दृष्टि से इन शब्दों को एक-दूसरे का पर्याय मान लेना उचित नहीं है। इनके बीच का अन्तर केवल शब्दों का अन्तर नहीं, बल्कि मनुष्य और उसके भविष्य को समझने की अलग-अलग दृष्टियों का अन्तर है।

‘भाग्य’ का सम्बन्ध सामान्यतः उस स्थिति से है जो किसी व्यक्ति को प्राप्त होती है। किसी को समृद्धि मिलती है, किसी को अभाव; किसी को अवसर मिलते हैं, किसी को संघर्ष; किसी का जीवन सहज दिखाई देता है और किसी का जीवन निरन्तर कठिनाइयों से घिरा रहता है। इन सबको देखकर मनुष्य कहता है—यह उसका भाग्य है। इस अर्थ में भाग्य प्रायः प्राप्त जीवन-स्थिति का नाम बन जाता है। वह पूछता है—मेरे साथ क्या हुआ? मुझे क्या मिला? मेरे जीवन में कौन-सी परिस्थितियाँ आईं?

भाग्य का यह अर्थ अनुभवपरक है। मनुष्य अपने जीवन को देखकर भाग्य की बात करता है। वह किसी दार्शनिक सिद्धान्त से प्रारम्भ नहीं करता; वह अपने अनुभव से प्रारम्भ करता है। इसलिए भाग्य का शब्द लोकजीवन में अत्यन्त शक्तिशाली है। इसमें मनुष्य की आशा, निराशा, असफलता और विस्मय—सब कुछ समा जाता है।

लेकिन नियति का प्रश्न इससे अलग है। नियति केवल यह नहीं पूछती कि मनुष्य को क्या प्राप्त हुआ। वह पूछती है—जो प्राप्त हुआ, उसकी दिशा किस व्यवस्था से निर्मित हुई? भाग्य जीवन की स्थिति को देखता है; नियति उस स्थिति के पीछे सम्भावित अनिवार्यता को खोजती है। भाग्य घटना का अनुभव है, नियति घटना की दार्शनिक व्याख्या का प्रश्न।

इस अन्तर को एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति को अचानक कोई बड़ी सफलता मिलती है, तो कहा जा सकता है कि उसका भाग्य अच्छा था। लेकिन यदि कोई दार्शनिक पूछे कि उस सफलता के पीछे कौन-कौन से कारण थे—उसकी प्रतिभा, उसका वातावरण, उसके अवसर, उसका निर्णय, संयोग या कोई अन्य व्यवस्था—तो वह नियति के प्रश्न के निकट पहुँच रहा है। भाग्य कहता है—यह हुआ। नियति पूछती है—क्या यह किसी अनिवार्य दिशा में होना था?

‘प्रारब्ध’ का प्रश्न इससे भी अधिक विशिष्ट है। भारतीय दार्शनिक परम्पराओं में प्रारब्ध का सम्बन्ध एक ऐसी पूर्वस्थित कारण-व्यवस्था से जोड़ा गया है, जिसके परिणाम वर्तमान जीवन में अनुभव किए जा रहे हैं। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है। प्रारब्ध को केवल ‘भाग्य’ कह देना उसके दार्शनिक अर्थ को अत्यन्त सरल बना देता है। प्रारब्ध के भीतर एक विशेष कारण-सिद्धान्त की पृष्ठभूमि होती है। वह किसी घटना को केवल संयोग या अज्ञात व्यवस्था के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे एक पूर्ववर्ती कारण-क्रम से जोड़ता है।

यहीं नियति और प्रारब्ध के बीच एक सूक्ष्म भेद दिखाई देता है। नियति एक व्यापक दार्शनिक प्रश्न है—क्या जीवन की दिशा किसी पूर्वस्थित व्यवस्था से निर्धारित होती है? प्रारब्ध उस प्रश्न का एक विशिष्ट दार्शनिक उत्तर हो सकता है—विशेषतः तब, जब उस व्यवस्था को किसी पूर्ववर्ती कारण-क्रम से जोड़ा जाए। इसलिए प्रत्येक प्रारब्ध की चर्चा नियति के प्रश्न से सम्बन्धित हो सकती है, लेकिन नियति को केवल प्रारब्ध तक सीमित नहीं किया जा सकता।

यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि उसका जीवन किसी पूर्वस्थित व्यवस्था के कारण इस दिशा में जा रहा है, तो वह नियति की बात कर रहा है। यदि वह यह कहता है कि वर्तमान अनुभव किसी विशिष्ट पूर्व कारण-क्रम का परिणाम है, तो वह प्रारब्ध की धारणा के निकट पहुँचता है। दोनों में सम्बन्ध है, लेकिन दोनों समान नहीं हैं।

अब ‘निर्धारणवाद’ की ओर आते हैं। निर्धारणवाद आधुनिक दार्शनिक और वैज्ञानिक चर्चा में प्रयुक्त एक अधिक विशिष्ट अवधारणा है। इसका मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी घटना की पूर्ण पूर्वस्थितियाँ और प्रकृति के नियम उस घटना को अनिवार्य रूप से निर्धारित करते हैं। यदि किसी क्षण में वास्तविकता की सम्पूर्ण अवस्था और उस पर लागू सभी नियम ज्ञात हों, तो क्या आगे की घटनाएँ अनिवार्य रूप से उसी क्रम में घटेंगी?

निर्धारणवाद का प्रश्न किसी दैवी सत्ता पर निर्भर नहीं है। वह यह नहीं कहता कि किसी देवता ने भविष्य लिख दिया है। वह केवल यह पूछता है कि क्या घटनाएँ कारणों और नियमों की ऐसी श्रृंखला में बँधी हैं, जिसमें प्रत्येक अगली अवस्था पिछली अवस्था से अनिवार्य रूप से निकलती है।

यहीं नियति और निर्धारणवाद के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण अन्तर दिखाई देता है। नियति में किसी व्यापक दिशा, पूर्वस्थित व्यवस्था या अनिवार्यता का प्रश्न हो सकता है। निर्धारणवाद उस प्रश्न को कारणता और नियमों की भाषा में अधिक कठोर रूप से प्रस्तुत करता है। नियति का स्वरूप धार्मिक, दार्शनिक या अस्तित्वगत हो सकता है; निर्धारणवाद का प्रश्न मुख्यतः कारणात्मक संरचना से सम्बन्धित है।

फिर भी दोनों के बीच एक गहरा सम्बन्ध है। यदि संसार की प्रत्येक घटना पूर्ववर्ती कारणों से अनिवार्य रूप से निर्धारित होती है, तो मनुष्य का भविष्य भी उसी कारण-व्यवस्था का भाग होगा। तब प्रश्न उठेगा—मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा का क्या होगा? क्या उसका निर्णय वास्तव में उसका अपना निर्णय है, या वह भी उन कारणों का परिणाम है जो उसके निर्णय से पहले उपस्थित थे?

यहीं एक और भ्रम जन्म लेता है। अनेक लोग यह मान लेते हैं कि यदि कोई घटना कारणों से उत्पन्न हुई है, तो वह मनुष्य की स्वतंत्रता के विरुद्ध अवश्य होगी। लेकिन यह निष्कर्ष भी अपने आप सिद्ध नहीं होता। क्योंकि स्वतंत्रता का अर्थ क्या है—यह स्वयं एक दार्शनिक प्रश्न है। यदि स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि निर्णय बिना किसी कारण के उत्पन्न हो, तो शायद कोई भी निर्णय स्वतंत्र नहीं कहा जा सकेगा। लेकिन यदि स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं, विचारों और समझ के अनुसार निर्णय ले सके, तो कारणता और स्वतंत्रता का सम्बन्ध अलग प्रकार से समझना होगा।

यहीं से नियति का प्रश्न और अधिक जटिल हो जाता है।

एक व्यक्ति कहता है—“मैंने यह निर्णय स्वयं लिया।” लेकिन उसके निर्णय के पीछे उसका स्वभाव, उसका अनुभव, उसका ज्ञान, उसका भय और उसकी इच्छा काम कर रहे थे। क्या इन सबका अस्तित्व उसके निर्णय से पहले नहीं था? यदि था, तो क्या उसका निर्णय पूरी तरह स्वतंत्र था? और यदि नहीं था, तो फिर स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?

यहाँ ‘भाग्य’ और ‘निर्धारणवाद’ के बीच का अन्तर विशेष रूप से स्पष्ट होता है। भाग्य प्रायः किसी घटना को स्वीकार कर लेने की भाषा है। निर्धारणवाद उस घटना की कारणात्मक संरचना को समझने का प्रयास है। भाग्य कहता है—“ऐसा होना था।” निर्धारणवाद पूछता है—“किन कारणों से ऐसा होना अनिवार्य हुआ?”

इसी प्रकार ‘नियति’ और ‘प्रारब्ध’ के बीच भी अन्तर समझना आवश्यक है। प्रारब्ध किसी विशिष्ट दार्शनिक कारण-व्यवस्था का संकेत कर सकता है, जबकि नियति उससे अधिक व्यापक प्रश्न है। नियति यह भी पूछ सकती है कि क्या प्रकृति के नियम स्वयं जीवन की दिशा को निर्धारित करते हैं। वह यह भी पूछ सकती है कि क्या मनुष्य की जैविक संरचना उसके निर्णयों की सीमा तय करती है। वह यह भी पूछ सकती है कि क्या समाज, भाषा और इतिहास किसी व्यक्ति के भविष्य को पहले से सीमित कर देते हैं।

इस प्रकार नियति का प्रश्न केवल अतीत से वर्तमान तक आने वाली किसी एक शक्ति का प्रश्न नहीं है। वह उन सभी पूर्वस्थितियों की समग्रता को देखने का प्रयास है, जो मनुष्य के भविष्य को किसी दिशा में ले जा सकती हैं।

यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। किसी घटना के पीछे कारणों का होना और उस घटना का पहले से निश्चित होना—दो अलग बातें हैं। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार पर उसके अनुभवों का प्रभाव है, तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उसका भविष्य पूरी तरह तय है। यदि किसी प्राकृतिक घटना की सम्भावना का अनुमान लगाया जा सकता है, तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वह घटना अनिवार्य है। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के जीवन में कुछ प्रवृत्तियाँ लगातार दिखाई देती हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि उसका पूरा जीवन पहले से निर्धारित हो।

यही कारण है कि नियति को भाग्य, प्रारब्ध और निर्धारणवाद से अलग करके समझना आवश्यक है। भाग्य अनुभव की भाषा है। प्रारब्ध एक विशिष्ट दार्शनिक कारण-व्यवस्था का संकेत कर सकता है। निर्धारणवाद कारणों और नियमों की अनिवार्यता का सिद्धान्त है। और नियति इन सभी प्रश्नों के बीच खड़ा हुआ वह व्यापक दार्शनिक प्रश्न है, जो पूछता है—

क्या मनुष्य का जीवन किसी ऐसी पूर्वस्थित व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसे वह स्वयं पूरी तरह चुन नहीं सकता?

शायद नियति की वास्तविक जटिलता यही है कि वह इन सभी अवधारणाओं को अपने भीतर छूती है, लेकिन किसी एक में पूरी तरह समा नहीं जाती। वह भाग्य से बड़ी है, प्रारब्ध से व्यापक है और निर्धारणवाद से अधिक अस्तित्वगत है।

और इसी कारण नियति का प्रश्न अन्ततः मनुष्य के सामने लौट आता है।

यदि जीवन में कुछ ऐसा है जो मनुष्य से पहले उपस्थित था, तो मनुष्य का अपना क्या है?

क्या वह केवल प्राप्त परिस्थितियों का परिणाम है?

या फिर उन परिस्थितियों के भीतर कोई ऐसी सम्भावना भी है, जहाँ से उसका अपना चुनाव आरम्भ होता है?

मुख्य विवाद

क्या नियति को भाग्य, प्रारब्ध और निर्धारणवाद से अलग समझना आवश्यक है, या ये सभी एक ही मूल वास्तविकता के अलग-अलग नाम हैं?

आज की शोध-स्थिति

आधुनिक दर्शन में नियति और निर्धारणवाद के बीच स्पष्ट भेद किया जाता है। भारतीय दार्शनिक परम्पराओं में भाग्य, दैव और प्रारब्ध की अवधारणाएँ अलग-अलग दार्शनिक पृष्ठभूमियों में विकसित हुई हैं। इनके बीच सम्बन्ध पर तुलनात्मक अध्ययन अभी भी एक सक्रिय शोध-विषय है।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न

यदि मनुष्य के जीवन की दिशा अनेक पूर्वस्थित कारणों से प्रभावित होती है, तो क्या ‘नियति’ उन कारणों का नाम है—या उन कारणों की अनिवार्यता का?

मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )



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