अध्याय–14 : नियति क्या है? -भाग–5 : भगवद्गीता और नियति का प्रश्न

 चिन्तन -अध्याय–14 : नियति क्या है? -भाग–5 : भगवद्गीता और नियति का प्रश्न

भगवद्गीता में नियति का प्रश्न किसी एक निश्चित सिद्धान्त के रूप में सामने नहीं आता। गीता का मूल प्रसंग ही ऐसा है जिसमें मनुष्य अपने निर्णय, अपने कर्तव्य और अपने अस्तित्व के बीच खड़ा है। अर्जुन के सामने युद्ध है, लेकिन उसका संकट केवल युद्ध का नहीं है। वह यह जानना चाहता है कि उसे क्या करना चाहिए। उसके सामने सम्बन्ध हैं, नैतिक दुविधा है, भविष्य की अनिश्चितता है और अपने निर्णय के परिणामों का भय है। इस अर्थ में अर्जुन का प्रश्न नियति के प्रश्न से बहुत गहरे जुड़ जाता है।

यदि मनुष्य अपने जीवन में किसी निर्णायक क्षण पर खड़ा होकर यह पूछता हैक्या मुझे यह करना ही था?तो वह नियति के प्रश्न के निकट पहुँच चुका होता है। अर्जुन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वह केवल युद्ध करने या करने का निर्णय नहीं ले रहा। वह अपने निर्णय की वास्तविक स्वतंत्रता को लेकर संकट में है।

अर्जुन का संकट और निर्णय की स्वतंत्रता

अर्जुन का विषाद इस बात का संकेत है कि वह अपने निर्णय को हल्के में नहीं लेता। वह युद्धभूमि में खड़ा होकर अपने सामने उपस्थित सम्बन्धों, सम्भावित परिणामों और नैतिक संकट को देखता है। यदि वह केवल किसी पूर्वनिर्धारित नियति का पात्र होता, तो उसका यह आन्तरिक संघर्ष अर्थहीन हो जाता। लेकिन गीता का पूरा संवाद इस बात पर आधारित है कि अर्जुन प्रश्न करता है, तर्क करता है, असहमति व्यक्त करता है और अन्ततः निर्णय लेता है।

यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक संकेत दिखाई देता है।

गीता मनुष्य को ऐसा प्राणी नहीं मानती जो केवल घटनाओं के प्रवाह में बह रहा हो। वह मनुष्य को विवेक करने वाला प्राणी मानती है। अर्जुन को कोई यांत्रिक आदेश नहीं दिया जाता। उसके सामने ज्ञान रखा जाता है। उसे विभिन्न दृष्टियों से वास्तविकता को देखने के लिए प्रेरित किया जाता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि गीता मनुष्य को पूर्णतः निरपेक्ष और असीम स्वतंत्र मानती है। बल्कि गीता का प्रश्न इससे अधिक जटिल हैमनुष्य किन शक्तियों से प्रभावित होकर निर्णय लेता है और वह अपने निर्णय को किस चेतना से देखता है?

प्रकृति और मनुष्य का व्यवहार

गीता में प्रकृति (Prakti) और उसके गुणों की चर्चा नियति के प्रश्न के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य का व्यवहार केवल उसकी घोषित इच्छा से निर्मित नहीं होता। उसके भीतर प्रकृति के विभिन्न गुणों की प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं। मनुष्य का स्वभाव, उसकी मानसिक संरचना और उसकी प्रवृत्तियाँ उसके व्यवहार को प्रभावित करती हैं।

गीता का एक प्रसिद्ध विचार है कि प्राणी प्रकृति के गुणों के अनुसार व्यवहार करता है और अहंकारवश यह मान सकता है कि वह स्वयं ही सब कुछ कर रहा है। इस विचार को यदि दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए, तो यहाँ मनुष्य की स्वतन्त्रता पर एक गम्भीर प्रश्न उठता है।

यदि मनुष्य का व्यवहार प्रकृति के गुणों से प्रभावित है, तो क्या उसका निर्णय वास्तव में उसका अपना है?

यहाँ गीता का उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म है। वह मनुष्य को केवल प्रकृति का कठपुतली नहीं बनाती। वह यह दिखाती है कि मनुष्य के व्यवहार में ऐसी शक्तियाँ काम करती हैं, जिन्हें वह प्रायः पहचानता तक नहीं। मनुष्य अपने निर्णयों कोमेरा निर्णयकहता है, लेकिन उसके भीतर प्रकृति, प्रवृत्ति और मानसिक संस्कारों का प्रभाव सक्रिय हो सकता है।

इस दृष्टि से गीता नियति को किसी बाहरी भाग्य के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व को प्रभावित करने वाली गहरी संरचनाओं के प्रश्न के रूप में देखने की सम्भावना खोलती है।

 

 

निमित्तऔर नियति का प्रश्न

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को एक व्यापक विश्व-व्यवस्था के भीतर देखने की दृष्टि देते हैं। विशेष रूप से विराट रूप के प्रसंग में अर्जुन के सामने समय और विनाश की एक ऐसी छवि आती है, जिसमें अनेक घटनाएँ मानो पहले से किसी व्यापक गति में प्रवाहित दिखाई देती हैं।

यहाँकाल’ (Time) का प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

यदि काल सबको अपने भीतर ले जा रहा है, तो मनुष्य की भूमिका क्या है? क्या वह केवल उस महान गति का एक माध्यम है?

गीता में अर्जुन कोनिमित्तबनने की बात कही जाती है। इस विचार को कई बार सरलता से यह कहकर समझा दिया जाता है कि मनुष्य केवल ईश्वर की योजना का उपकरण है। लेकिन दार्शनिक दृष्टि से यह व्याख्या अधूरी होगी।

निमित्तकी धारणा मनुष्य की भूमिका को समाप्त नहीं करती; वह उसकी भूमिका को एक व्यापक व्यवस्था के भीतर रखती है। अर्जुन को युद्धभूमि से हट जाने की छूट नहीं दी जाती। उसे अपने निर्णय और अपने कर्तव्य का सामना करना पड़ता है। वह निष्क्रिय होकर नियति की प्रतीक्षा नहीं करता।

यहीं एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक भेद सामने आता है

नियति का स्वीकार और निष्क्रिय समर्पण एक ही बात नहीं हैं।

यदि कोई व्यक्ति यह मानकर कुछ करे कि सब कुछ पहले से तय है, तो यह नियतिवाद की निष्क्रिय व्याख्या हो सकती है। लेकिन गीता मनुष्य को कर्म से विमुख नहीं करती। वह उसे अपने कर्म, अपने स्वभाव और अपनी चेतना के सम्बन्ध को समझने के लिए प्रेरित करती है।

क्या गीता में सब कुछ पहले से निश्चित है?

गीता के कुछ वचनों को पढ़कर यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या गीता पूर्ण पूर्वनिर्धारण (Predetermination) को स्वीकार करती है। यदि ईश्वर सबके हृदय में स्थित होकर उन्हें संचालित करता है, यदि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार कार्य कराती है और यदि काल सबको अपने भीतर ले जाता है, तो मनुष्य की स्वतंत्रता कहाँ बचती है?

यह प्रश्न गीता के साथ एक वास्तविक दार्शनिक चुनौती प्रस्तुत करता है।

एक ओर गीता व्यापक सत्ता और विश्व-व्यवस्था की बात करती है। दूसरी ओर वह अर्जुन से कहती है कि वह विचार करे और फिर जैसा उचित समझे, वैसा करे। यह अन्तिम संकेत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

यहाँ गीता का दार्शनिक तनाव स्पष्ट दिखाई देता है। मनुष्य एक व्यापक व्यवस्था के भीतर है, लेकिन उसके भीतर विचार करने और निर्णय लेने की क्षमता को नकारा नहीं गया। गीता मनुष्य को पूर्णतः स्वतन्त्र भी नहीं मानती और पूर्णतः असहाय भी नहीं बनाती।

शायद गीता की दृष्टि में स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य किसी भी कारण से पूरी तरह मुक्त होकर निर्णय लेता है। बल्कि स्वतंत्रता का अर्थ यह हो सकता है कि मनुष्य अपनी स्थिति, अपनी प्रकृति और अपने भ्रम को समझते हुए अधिक जागरूक होकर निर्णय ले।

ज्ञान और नियति का सम्बन्ध

गीता में ज्ञान का उद्देश्य केवल सूचना प्राप्त करना नहीं है। ज्ञान मनुष्य की दृष्टि को बदलता है। जो मनुष्य अपने को केवल शरीर, इच्छा और तत्कालिक भावनाओं के रूप में देखता है, उसका निर्णय एक प्रकार का होगा। जो मनुष्य अपने अस्तित्व को व्यापक वास्तविकता के सन्दर्भ में देखता है, उसका निर्णय दूसरी प्रकार का हो सकता है।

इस दृष्टि से ज्ञान नियति को बदलता है या नहींयह प्रश्न भी सूक्ष्म हो जाता है।

यदि नियति का अर्थ बाहरी घटनाओं का पूर्वनिर्धारण है, तो ज्ञान के द्वारा उसे बदलने का प्रश्न अलग होगा। लेकिन यदि नियति का सम्बन्ध मनुष्य की चेतना और उसके जीवन की दिशा से है, तो ज्ञान उस दिशा को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

गीता कास्थितप्रज्ञमनुष्य उसी बाहरी संसार में रहता है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया, उसकी दृष्टि और उसका निर्णय बदल जाता है। यह परिवर्तन नियति के प्रश्न को एक नये स्तर पर ले जाता है।

शायद मनुष्य हमेशा घटनाओं को नहीं बदल सकता, लेकिन वह घटनाओं के भीतर अपनी चेतना की स्थिति बदल सकता है।

और यदि चेतना की स्थिति निर्णयों को प्रभावित करती है, तो भविष्य की दिशा पर भी उसका प्रभाव सम्भव है।

गीता और नियति का दार्शनिक तनाव

गीता को तो सरल नियतिवादी ग्रन्थ कहा जा सकता है और ही आधुनिक अर्थों में पूर्ण स्वतंत्र इच्छा का घोषणापत्र। गीता का मनुष्य प्रकृति, काल और व्यापक विश्व-व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। लेकिन वह विचार, विवेक और निर्णय की क्षमता से भी सम्पन्न है।

गीता का महत्त्व इसी तनाव में है।

वह मनुष्य से यह नहीं कहती कि तुम्हारे जीवन में कुछ भी तुम्हारे नियन्त्रण से बाहर नहीं है। और ही वह यह कहती है कि तुम केवल एक निष्क्रिय पात्र हो।

इसके बजाय वह मनुष्य को एक जटिल वास्तविकता के भीतर खड़ा करती है और पूछती है

तुम्हारी प्रकृति तुम्हें प्रभावित करती है, लेकिन क्या तुम अपनी प्रकृति को देख सकते हो?

यदि तुम उसे देख सकते हो, तो क्या उस देखने में कोई नई सम्भावना जन्म लेती है?

यहीं गीता नियति के प्रश्न को एक गहरी दिशा देती है। नियति केवल बाहरी घटनाओं की पूर्वव्यवस्था नहीं है। मनुष्य की अपनी अचेतन प्रवृत्तियाँ भी उसके जीवन की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं। और आत्मज्ञान का अर्थ सम्भवतः इस अचेतन प्रभाव को पहचानना है।

इस अर्थ में गीता मनुष्य को नियति के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी स्थिति को समझने के लिए प्रेरित करती है।

और शायद यही उसका सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक संकेत है

मनुष्य की स्वतंत्रता उस क्षण से आरम्भ हो सकती है, जब वह अपने भीतर काम कर रही शक्तियों कोमैंकहकर स्वीकार करने के बजाय उन्हें देखना शुरू करता है।

मुख्य विवाद

क्या गीता प्रकृति, काल और व्यापक विश्व-व्यवस्था के कारण मनुष्य की स्वतंत्रता को सीमित करती है, या ज्ञान और विवेक के माध्यम से स्वतंत्रता की एक गहरी सम्भावना प्रस्तुत करती है?

आज की शोध-स्थिति

गीता में नियति और स्वतंत्र इच्छा पर कोई एक सर्वमान्य व्याख्या नहीं है। विभिन्न भाष्य-परम्पराएँ प्रकृति, ईश्वर, काल, कर्म और पुरुषार्थ के सम्बन्ध को अलग-अलग प्रकार से समझती हैं। आधुनिक दार्शनिक अध्ययन गीता को पूर्ण नियतिवाद और पूर्ण स्वतंत्रतावाददोनों से अधिक जटिल चिन्तन के रूप में देखते हैं।

 अब भी अनुत्तरित प्रश्न

यदि मनुष्य का स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियाँ उसके निर्णयों को प्रभावित करती हैं, तो क्या अपने स्वभाव को जान लेना ही स्वतंत्रता की पहली अवस्था है?

मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )


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