चिन्तन - अध्याय–14 : नियति क्या है? - भाग–7 : योग — संस्कार, चित्त और नियति

अध्याय–14 : नियति क्या है? - भाग–7 : योग — संस्कार, चित्त और नियति

यदि सांख्य ने मनुष्य के अस्तित्व को प्रकृति और पुरुष के बीच विभाजित करके नियति के प्रश्न को दार्शनिक आधार दिया, तो योग दर्शन उसी प्रश्न को मनुष्य के आन्तरिक अनुभव और मानसिक संरचना के स्तर पर ले आता है। योग के लिए यह जानना पर्याप्त नहीं है कि मनुष्य प्रकृति से प्रभावित है। उसके लिए यह समझना भी आवश्यक है कि मनुष्य के भीतर ऐसी कौन-सी मानसिक प्रक्रियाएँ हैं, जो उसके अनुभव, उसकी इच्छाओं और उसके निर्णयों को बार-बार एक ही दिशा में ले जाती हैं।

यहीं से योग दर्शन में चित्त (Citta), वृत्ति (Vṛtti) और संस्कार (Saṃskāra) की अवधारणाएँ नियति के प्रश्न से जुड़ती हैं।

चित्त की गति और जीवन की दिशा

योग दर्शन मनुष्य के मानसिक जीवन को स्थिर और निष्क्रिय नहीं मानता। चित्त निरन्तर परिवर्तनशील है। उसमें विचार उठते हैं, स्मृतियाँ आती हैं, इच्छाएँ जन्म लेती हैं और अनुभवों की छापें जमा होती रहती हैं।

मनुष्य अपने जीवन को वर्तमान क्षण से बना हुआ समझता है, लेकिन योग की दृष्टि में वर्तमान के भीतर अतीत की अनेक परतें सक्रिय रहती हैं। कोई पुराना अनुभव आज की प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है। कोई भय, जिसका मनुष्य को स्पष्ट स्मरण भी न हो, उसके निर्णयों की दिशा बदल सकता है। कोई आदत बार-बार दोहराते हुए उसके स्वभाव का हिस्सा बन सकती है।

तब प्रश्न उठता है—

क्या मनुष्य वर्तमान में निर्णय ले रहा है, या अतीत उसके भीतर निर्णय ले रहा है?

योग दर्शन का महत्त्व इसी प्रश्न को अत्यन्त सूक्ष्म रूप से देखने में है।

संस्कार : अतीत की अदृश्य उपस्थिति

संस्कार का सामान्य अर्थ किसी अनुभव की मानसिक छाप के रूप में समझा जा सकता है। मनुष्य जो अनुभव करता है, वह केवल स्मृति के रूप में सुरक्षित नहीं रहता। वह उसके भीतर एक प्रवृत्ति भी निर्मित कर सकता है।

एक व्यक्ति किसी परिस्थिति में बार-बार भयभीत होता है। धीरे-धीरे उसका चित्त उस परिस्थिति को भय से जोड़ने लगता है। किसी दूसरे व्यक्ति को किसी विशेष प्रकार के व्यवहार से बार-बार सुख मिलता है और वह उसी सुख की पुनरावृत्ति चाहता है।

इस प्रकार अनुभव धीरे-धीरे प्रतिक्रिया का ढाँचा बना सकते हैं।

यहीं नियति का एक अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक रूप दिखाई देता है।

यदि किसी व्यक्ति के भीतर कुछ संस्कार लगातार सक्रिय हैं, तो उसके निर्णयों की दिशा भी कुछ सीमा तक अनुमानित हो सकती है। वह समान परिस्थितियों में समान प्रकार से प्रतिक्रिया दे सकता है। उसे लगता है कि वह हर बार स्वतंत्र निर्णय ले रहा है, लेकिन सम्भव है कि उसके भीतर कोई पुराना संस्कार बार-बार वही निर्णय उत्पन्न कर रहा हो।

इस दृष्टि से योग दर्शन एक अत्यन्त गम्भीर प्रश्न पूछता है—

क्या मनुष्य की नियति बाहरी घटनाओं से अधिक उसके भीतर जमा हुई प्रतिक्रियाओं में छिपी हो सकती है?

वासना और पुनरावृत्ति

योग परम्परा में वासनाओं का सम्बन्ध उन गहरी प्रवृत्तियों से है, जो मनुष्य के व्यवहार को दिशा देती हैं। मनुष्य किसी वस्तु की इच्छा करता है। इच्छा पूरी होती है। अनुभव की छाप बनती है। फिर वही इच्छा किसी नए रूप में पुनः उत्पन्न हो सकती है।

इस प्रकार मनुष्य अनेक बार अपने ही भीतर एक चक्र निर्मित कर लेता है।

वह कहता है—

मैं ऐसा ही हूँ।

लेकिन योग पूछता है—

क्या तुम सचमुच ऐसे ही हो, या तुम्हारी वासनाएँ तुम्हें बार-बार ऐसा बना रही हैं?

यह प्रश्न नियति के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यदि मनुष्य की इच्छाएँ ही उसके निर्णयों को संचालित करती हैं और इच्छाएँ पूर्व अनुभवों से प्रभावित हैं, तो उसका भविष्य उसके अतीत से गहरे जुड़ जाता है।

तब नियति किसी बाहरी शक्ति का नाम नहीं रह जाती।

वह मनुष्य के भीतर चल रही पुनरावृत्ति का नाम भी हो सकती है।

योग और परिवर्तन की सम्भावना

लेकिन योग दर्शन यहीं रुकता नहीं। यदि संस्कार मनुष्य को प्रभावित करते हैं, तो क्या उनसे मुक्ति सम्भव है?

योग का उत्तर है—अभ्यास और वैराग्य।

यहाँ योग का महत्त्वपूर्ण दार्शनिक पक्ष सामने आता है। योग मनुष्य को पूर्णतः पूर्वनिर्धारित नहीं मानता। वह स्वीकार करता है कि चित्त की वर्तमान स्थिति अतीत की छापों से प्रभावित है, लेकिन वह यह भी मानता है कि चित्त पर कार्य किया जा सकता है।

अभ्यास का अर्थ केवल किसी शारीरिक क्रिया की पुनरावृत्ति नहीं है। व्यापक अर्थ में यह चेतना को एक दिशा में प्रशिक्षित करने का प्रयास है। वैराग्य का अर्थ केवल संसार से भाग जाना नहीं, बल्कि मन की आसक्ति और प्रतिक्रिया को पहचानना भी है।

इस दृष्टि से योग नियति के प्रश्न को व्यावहारिक बना देता है।

यदि मनुष्य अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को पहचान सकता है, तो वह उनके साथ अपने सम्बन्ध को बदल सकता है।

और यदि उसका सम्बन्ध बदलता है, तो उसके निर्णयों की दिशा भी बदल सकती है।

क्या संस्कार नियति हैं?

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। संस्कारों को नियति का पर्याय मान लेना उचित नहीं होगा। संस्कार मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन हर संस्कार का प्रभाव अनिवार्य हो—यह निष्कर्ष योग से सीधे प्राप्त नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति क्रोधी प्रवृत्ति रखता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रत्येक परिस्थिति में क्रोध करेगा। यदि किसी व्यक्ति में भय का संस्कार है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह हर बार भय के सामने पराजित होगा।

संस्कार सम्भावित दिशा दे सकते हैं।

लेकिन सम्भावना और अनिवार्यता एक ही बात नहीं हैं।

यही बिन्दु योग दर्शन को कठोर नियतिवाद से अलग करता है।

योग के लिए मनुष्य का चित्त बँधा हुआ है, लेकिन उस बन्धन को देखने और उस पर कार्य करने की सम्भावना भी उसी मनुष्य में है।

चित्तवृत्ति और स्वतंत्रता

योगसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र है—“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”

इस सूत्र को सामान्यतः योग की परिभाषा के रूप में समझा जाता है। लेकिन नियति के प्रश्न की दृष्टि से इसका एक गहरा अर्थ सामने आता है।

यदि चित्त निरन्तर वृत्तियों से संचालित है, तो मनुष्य की दृष्टि भी उन्हीं वृत्तियों से प्रभावित होगी। वह संसार को जैसा है वैसा नहीं, बल्कि अपने चित्त की संरचना के माध्यम से देखेगा।

एक ही घटना दो व्यक्तियों में दो अलग प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकती है। घटना एक है, लेकिन चित्त की संरचना अलग है।

तो क्या मनुष्य का भविष्य केवल बाहरी घटनाओं से निर्मित होता है?

नहीं।

उसकी आन्तरिक प्रतिक्रिया भी उसके जीवन की दिशा को प्रभावित करती है।

इस दृष्टि से योग मनुष्य की नियति को बाहरी घटनाओं के साथ-साथ उसकी मानसिक संरचना से भी जोड़ता है।

योग और आधुनिक मनोविज्ञान

योग दर्शन को आधुनिक मनोविज्ञान का वैज्ञानिक विकल्प नहीं माना जा सकता। दोनों की भाषा, पद्धति और ज्ञानमीमांसा अलग हैं। फिर भी संस्कार, आदत, मानसिक पुनरावृत्ति और अवचेतन प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में एक तुलनात्मक संवाद सम्भव है।

आधुनिक मनोविज्ञान यह अध्ययन करता है कि मनुष्य के अनुभव, आदतें और मानसिक संरचनाएँ उसके निर्णयों को कैसे प्रभावित करती हैं। योग दर्शन चित्त की वृत्तियों और संस्कारों के माध्यम से इसी प्रकार के प्रश्न को एक अलग दार्शनिक भाषा में देखता है।

यहाँ समानता का दावा करना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों परम्पराएँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न साझा करती हैं—

क्या मनुष्य अपने व्यवहार के उन कारणों को जानता है, जो उसके भीतर सक्रिय हैं?

यदि उत्तर नहीं है, तो उसकी स्वतंत्रता का प्रश्न स्वाभाविक रूप से जटिल हो जाता है।

योग का नियति-विमर्श

योग दर्शन की दृष्टि में मनुष्य का जीवन केवल बाहरी घटनाओं का परिणाम नहीं है। उसके भीतर संस्कारों, वासनाओं और चित्तवृत्तियों की एक निरन्तर गति चलती रहती है। यह गति उसके अनुभवों और निर्णयों को प्रभावित करती है।

इस अर्थ में मनुष्य अपनी ही मानसिक संरचना से एक प्रकार की नियति निर्मित कर सकता है।

वह बार-बार वही सोचता है।

वही चाहता है।

वही प्रतिक्रिया देता है।

और फिर कहता है—

मेरे साथ हमेशा ऐसा ही होता है।

योग सम्भवतः इस वाक्य को उलटकर पूछेगा—

क्या तुम्हारे साथ हमेशा ऐसा होता है, या तुम हर बार उसी प्रकार प्रतिक्रिया करते हो?

यहीं योग नियति के प्रश्न में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सम्भावना प्रस्तुत करता है।

मनुष्य की नियति कभी-कभी बाहर से थोपी हुई व्यवस्था नहीं, बल्कि भीतर दोहराई जा रही अचेतन प्रवृत्ति हो सकती है।

और यदि वह प्रवृत्ति देखी जा सके, तो सम्भव है कि नियति का मार्ग भी पहली बार प्रश्न के सामने खड़ा हो जाए।

मुख्य विवाद

क्या संस्कार और चित्तवृत्तियाँ मनुष्य के निर्णयों को केवल प्रभावित करती हैं, या वे उसके व्यवहार को अनिवार्य रूप से निर्धारित करती हैं?

आज की शोध-स्थिति

योग दर्शन के संस्कार-सिद्धान्त और आधुनिक मनोविज्ञान के बीच प्रत्यक्ष समानता स्थापित करना उचित नहीं है। फिर भी आदत, मानसिक पुनरावृत्ति, अवचेतन प्रभाव और व्यवहारिक प्रवृत्तियों पर तुलनात्मक अध्ययन के लिए योग-दर्शन एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक स्रोत बना हुआ है।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न

यदि मनुष्य अपने संस्कारों को पहचान ले, तो क्या वह उनसे मुक्त हो जाता है—या केवल यह जान पाता है कि उसके भीतर कौन-सी शक्तियाँ उसकी दिशा तय कर रही हैं?


मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )


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