चिन्तन -ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड -भाग–15 : समन्वित निष्कर्ष — चेतना की खोज और मानव ज्ञान की भविष्य-यात्रा
ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड | अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन | फ़ाइल–010 | अध्याय–10 : चेतना क्या है? | भाग–15 : समन्वित निष्कर्ष — चेतना की खोज और मानव ज्ञान की भविष्य-यात्रा
भाग–15
: समन्वित निष्कर्ष — चेतना की खोज और मानव ज्ञान की भविष्य-यात्रा
(Integrated Conclusion: The Search for Consciousness
and the Future of Human Knowledge)
इस
अध्याय का प्रारम्भ एक सरल किन्तु गहन प्रश्न से हुआ था—
चेतना
क्या है?
प्रथम
दृष्टि में यह प्रश्न सहज प्रतीत होता है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य अनुभव करता है।
वह देखता है, सुनता है, सोचता है, स्मरण करता है और स्वयं के अस्तित्व का बोध भी रखता
है। ऐसा प्रतीत होता है कि चेतना हमारे जीवन का सबसे निकटतम अनुभव है। परन्तु जैसे-जैसे
इस अनुभव को समझने का प्रयास किया जाता है, यह स्पष्ट होता जाता है कि चेतना उतनी ही
रहस्यमय है जितनी निकट।
यही
कारण है कि सहस्राब्दियों से यह प्रश्न मानव चिन्तन के केन्द्र में बना हुआ है।
इस
अध्याय में हमने देखा कि भारतीय दर्शन की विभिन्न परम्पराएँ—वेदान्त, सांख्य, योग,
बौद्ध, जैन तथा कश्मीर शैव दर्शन—चेतना की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत करती हैं।
कहीं
चेतना परम ब्रह्म है।
कहीं
वह पुरुष है।
कहीं
वह क्षण-क्षण प्रवाहित होने वाली प्रक्रिया है।
कहीं
प्रत्येक जीव का स्वाभाविक गुण है।
कहीं
वही परमशिव की स्वप्रकाशित सत्ता है।
इन
सभी मतों में मतभेद हैं, किन्तु एक समानता भी है—
चेतना
को उन्होंने मानव अस्तित्व का केन्द्रीय प्रश्न माना है।
पाश्चात्य दर्शन की यात्रा
पाश्चात्य
दर्शन ने भी इसी प्रश्न को अपने ढंग से समझने का प्रयास किया।
प्लेटो
की आत्मा से लेकर डेसकार्त के मन–शरीर द्वैत तक, कान्ट की अनुभव-रचना से लेकर हुसर्ल
के प्रज्ञानुभववाद तक, और डेविड चाल्मर्स के Hard Problem तक—चेतना निरन्तर दार्शनिक
अनुसन्धान का विषय बनी रही।
यह
यात्रा बताती है कि विभिन्न सभ्यताएँ भिन्न भाषा और पद्धति अपनाने के बाद भी अन्ततः
उसी रहस्य के सामने आकर खड़ी हो जाती हैं—
अनुभव
क्यों है?
विज्ञान
की उपलब्धियाँ और उसकी विनम्रता
आधुनिक
तंत्रिका-विज्ञान ने चेतना के अध्ययन में अभूतपूर्व प्रगति की है।
आज
हम जानते हैं कि मस्तिष्क के कौन-से क्षेत्र विभिन्न अनुभवों से सम्बद्ध हैं।
हम
नींद, स्वप्न, संज्ञाहरण, कोमा और ध्यान जैसी अवस्थाओं का अध्ययन कर सकते हैं।
हम
मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों को माप सकते हैं।
हम
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण कर सकते हैं।
किन्तु
इन सब उपलब्धियों के बावजूद विज्ञान स्वयं स्वीकार करता है कि—
व्यक्तिनिष्ठ
अनुभव (Subjective Experience) की अंतिम प्रकृति अभी भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है।
यह
स्वीकारोक्ति विज्ञान की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक ईमानदारी का प्रमाण है।
इस
अध्याय का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी था कि दर्शन और विज्ञान को परस्पर विरोधी ध्रुवों
के रूप में न देखा जाए।
दर्शन
ऐसे प्रश्न पूछता है जिन्हें विज्ञान कभी-कभी माप नहीं सकता।
विज्ञान
ऐसे उत्तर खोजता है जिन्हें दर्शन केवल तर्क से सिद्ध नहीं कर सकता।
दोनों
की सीमाएँ हैं।
दोनों
की शक्तियाँ भी हैं।
इसलिए
चेतना के अध्ययन में प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संवाद अधिक फलदायी है।
संवाद
का अर्थ सहमति नहीं होता।
संवाद
का अर्थ है— असहमति के साथ भी सत्य की संयुक्त खोज।
चेतना : वस्तु नहीं, प्रश्न
इस
सम्पूर्ण अध्ययन से एक बात स्पष्ट होती है—
चेतना
को केवल किसी वस्तु की तरह परिभाषित करना सम्भव नहीं है।
वह
स्वयं वह आधार है जिसके कारण वस्तुओं का ज्ञान सम्भव होता है।
हम
किसी ग्रह, परमाणु या कोशिका का निरीक्षण कर सकते हैं।
किन्तु
चेतना वही सत्ता है जिसके माध्यम से निरीक्षण सम्भव होता है।
इसलिए
चेतना केवल अध्ययन का विषय (Object of Study) नहीं है।
वह
अध्ययन की पूर्वशर्त (Condition of Knowing) भी है।
यही
तथ्य चेतना को अन्य सभी वैज्ञानिक और दार्शनिक विषयों से विशिष्ट बनाता है।
भविष्य की दिशा
आने
वाले दशकों में चेतना-अध्ययन सम्भवतः मानव ज्ञान का सबसे महत्त्वपूर्ण अनुसन्धान-क्षेत्र
बनने जा रहा है।
तंत्रिका-विज्ञान
अधिक सूक्ष्म होगा।
कृत्रिम
बुद्धिमत्ता अधिक जटिल होगी।
संज्ञान-विज्ञान
नए प्रतिमान प्रस्तुत करेगा।
ध्यान,
मानसिक प्रशिक्षण और चेतन अवस्थाओं पर अनुसन्धान और विस्तृत होगा।
साथ
ही, दर्शन नए प्रश्न उठाता रहेगा—
- क्या
कृत्रिम बुद्धिमत्ता कभी वास्तव में चेतन होगी?
- क्या
व्यक्तिनिष्ठ अनुभव को पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा में व्यक्त किया जा सकेगा?
- क्या
मस्तिष्क और चेतना का सम्बन्ध कारणात्मक है या अभिव्यक्तिक?
- क्या
ब्रह्माण्ड में चेतना एक अपवाद है, या अस्तित्व का मूल आयाम?
इन
प्रश्नों के उत्तर भविष्य के अनुसन्धान पर निर्भर करेंगे।
इस ग्रंथ की स्थिति
इस
ग्रंथ ने इन प्रश्नों के अंतिम उत्तर देने का दावा नहीं किया है।
इसका
उद्देश्य विभिन्न दार्शनिक और वैज्ञानिक परम्पराओं का निष्पक्ष, तुलनात्मक और शोधपरक
अध्ययन प्रस्तुत करना है।
जहाँ
प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें स्वीकार करना।
जहाँ
मतभेद हैं, वहाँ उन्हें स्पष्ट करना।
और
जहाँ ज्ञान अभी अपूर्ण है, वहाँ उस अपूर्णता को ईमानदारी से स्वीकार करना।
यही
किसी दार्शनिक ग्रंथ की बौद्धिक मर्यादा है।
अंतिम चिंतन
मानव
इतिहास में अनेक प्रश्न समय के साथ हल हो गए।
पृथ्वी
का आकार ज्ञात हुआ।
ग्रहों
की गति समझी गई।
जीवन
की आनुवंशिक संरचना का रहस्य उद्घाटित हुआ।
परन्तु
एक प्रश्न आज भी उतना ही जीवित है जितना सहस्रों वर्ष पूर्व था—
जो
यह सब जान रहा है, वह कौन है?
शायद
यही कारण है कि चेतना का प्रश्न केवल विज्ञान का प्रश्न नहीं है।
यह
केवल दर्शन का प्रश्न भी नहीं है।
यह
मनुष्य होने का प्रश्न है।
और
जब तक मनुष्य स्वयं से यह पूछता रहेगा—
"मैं
कौन हूँ?"
तब
तक चेतना की खोज समाप्त नहीं होगी।
उपसंहार
यह
अध्याय किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि एक नई यात्रा के द्वार पर समाप्त होता है।
क्योंकि
प्रत्येक उत्तर के भीतर एक नया प्रश्न छिपा होता है।
और
चेतना का अध्ययन हमें यही सिखाता है कि ज्ञान का सर्वोच्च रूप केवल उत्तरों का संग्रह
नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की परिपक्वता है।
अतः
इस अध्याय का समापन किसी घोषणा के साथ नहीं, बल्कि एक निमंत्रण के साथ किया जा सकता
है—
चेतना को
केवल पढ़िए मत।
उसे समझने का प्रयास कीजिए।
और उससे भी आगे—
उसे अनुभव कीजिए।
तभी
सम्भव है कि दर्शन शास्त्र बनकर न रह जाए, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष बोध बन सके।
मुकेश श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )
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