चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–4 : काल और कारणता — “पहले” क्या “कारण” है?
चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–4 : काल और कारणता — “पहले” क्या “कारण” है?
कारणता के प्रश्न पर आते ही मनुष्य का ध्यान स्वाभाविक रूप से काल की ओर जाता है।
क्योंकि जब हम कहते हैं—“यह इसके कारण हुआ”—तो हमारे वाक्य में प्रायः एक क्रम छिपा होता है।
पहले कारण।
फिर परिणाम।
पहले आग।
फिर जल का गर्म होना।
पहले पत्थर का फेंका जाना।
फिर शीशे का टूटना।
पहले बीज।
फिर अंकुर।
यहीं से मनुष्य के भीतर एक सरल धारणा बनती है—
जो पहले घटित हुआ, वही बाद में घटित होने वाली घटना का कारण होगा।
किन्तु क्या “पहले” होना ही “कारण” होना है?
यही वह बिन्दु है जहाँ काल और कारणता को अलग-अलग समझना आवश्यक हो जाता है।
काल (Time) घटनाओं के क्रम का प्रश्न है।
कारणता (Causality) घटनाओं के सम्बन्ध का प्रश्न है।
काल पूछता है—
“यह कब हुआ?”
कारणता पूछती है—
“यह क्यों हुआ?”
दोनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, किन्तु दोनों एक ही प्रश्न नहीं हैं।
यदि घटना A, घटना B से पहले घटित हुई, तो हम केवल इतना जानते हैं कि A कालिक रूप से पहले थी।
इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि A ने B को उत्पन्न किया।
मान लीजिए कोई व्यक्ति सुबह घर से बाहर निकला और उसी दिन शहर में वर्षा हुई। उसका घर से बाहर निकलना वर्षा से पहले हुआ। किन्तु क्या उसके बाहर निकलने से वर्षा हुई?
स्पष्ट है—नहीं।
यह उदाहरण साधारण है, किन्तु इसके भीतर कारणता की एक मूलभूत समस्या छिपी है।
मनुष्य का मन घटनाओं के क्रम को देखकर उनके बीच सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अत्यन्त शीघ्रता से तैयार हो जाता है।
पहले हुआ।
फिर दूसरा हुआ।
इसलिए—
पहली घटना दूसरी का कारण होगी।
यही कारणता के भ्रम का एक प्रारम्भिक रूप है।
वास्तविक कारणता के लिए केवल कालिक क्रम पर्याप्त नहीं है।
किन्तु यहाँ एक और प्रश्न उठता है।
यदि कारण परिणाम से पहले नहीं होता, तो क्या कारणता सम्भव है?
सामान्य अनुभव के स्तर पर हम कहेंगे—नहीं।
कारण और परिणाम के बीच किसी प्रकार का कालिक सम्बन्ध होना आवश्यक प्रतीत होता है। यदि शीशा पहले ही टूट चुका हो और उसके बाद पत्थर फेंका जाए, तो सामान्य अर्थ में पत्थर को शीशे के टूटने का कारण नहीं कहा जा सकता।
इसलिए काल कारणता के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है, किन्तु काल स्वयं कारणता नहीं है।
यही अन्तर इस पूरे अध्याय का एक मूलभूत आधार है।
कालिक क्रम कारणता के लिए आवश्यक परिस्थिति हो सकता है; किन्तु वह कारणात्मक सम्बन्ध का पर्याप्त प्रमाण नहीं है।
यह बात विज्ञान में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
मान लीजिए किसी बीमारी के बाद किसी औषधि का सेवन किया गया और उसके बाद रोगी स्वस्थ हो गया। यहाँ औषधि का सेवन स्वास्थ्य-लाभ से पहले हुआ। किन्तु क्या केवल इस क्रम के आधार पर यह सिद्ध हो जाता है कि औषधि ने ही रोगी को स्वस्थ किया?
नहीं।
रोग की स्वाभाविक प्रक्रिया, अन्य उपचार, रोगी की प्रतिरोधक क्षमता और अनेक अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए विज्ञान केवल यह नहीं पूछता कि—
“पहले क्या हुआ?”
वह यह भी पूछता है—
“क्या पहले हुई घटना ने वास्तव में बाद की घटना को प्रभावित किया?”
यहीं से कारणात्मक अनुसन्धान (Causal Investigation) का जन्म होता है।
अब हम एक और गहरे प्रश्न की ओर बढ़ते हैं।
यदि कारण हमेशा परिणाम से पहले आता है, तो क्या कारणता मूलतः काल पर निर्भर है?
यह प्रश्न विशेष रूप से तब कठिन हो जाता है जब हम ब्रह्माण्ड और भौतिकी की ओर देखते हैं।
दैनिक जीवन में समय हमें एक सीधी रेखा की तरह अनुभव होता है।
पहले अतीत।
फिर वर्तमान।
फिर भविष्य।
किन्तु वास्तविकता के प्रत्येक स्तर पर घटनाओं का सम्बन्ध इतना सरल नहीं हो सकता।
कारणता की संरचना को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि कौन-सी घटनाएँ एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं और कौन-सी नहीं।
किसी दूरस्थ घटना का हमारे स्थानीय परिणाम पर कोई प्रभाव हो सकता है या नहीं—यह केवल इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वह घटना हमारे लिए “पहले” दिखाई देती है।
अर्थात्, कारणता का प्रश्न केवल कालिक क्रम का प्रश्न नहीं है।
यह प्रभाव की सम्भावना का प्रश्न भी है।
यहीं आधुनिक भौतिकी में कारणात्मक संरचना (Causal Structure) की धारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
किन्तु इससे पहले हमें एक और सामान्य भ्रम को समझना होगा।
कभी-कभी मनुष्य कारण को परिणाम के बहुत निकट खोजता है।
यदि किसी व्यक्ति को किसी घटना के तुरन्त बाद कोई परिवर्तन दिखाई देता है, तो वह दोनों को जोड़ देता है।
यदि परिवर्तन देर से दिखाई दे, तो वह कारण को पहचानने में कठिनाई अनुभव करता है।
किन्तु कारणता और निकटता भी एक ही बात नहीं हैं।
बीज बोने और वृक्ष बनने के बीच वर्षों का अन्तर हो सकता है।
किसी मानसिक अनुभव का प्रभाव वर्षों बाद किसी निर्णय में दिखाई दे सकता है।
किसी सामाजिक व्यवस्था का प्रभाव कई पीढ़ियों बाद सामने आ सकता है।
इसलिए कारण और परिणाम के बीच कालिक दूरी कारणता को समाप्त नहीं करती।
यह केवल कारणात्मक सम्बन्ध को अधिक जटिल बना सकती है।
यहाँ हम एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचते हैं।
कारणता में काल का होना आवश्यक हो सकता है, किन्तु कारणता को केवल काल से समझा नहीं जा सकता।
काल हमें घटनाओं का क्रम देता है।
कारणता हमें घटनाओं के बीच प्रभाव और सम्बन्ध को समझने का प्रयास कराती है।
काल कहता है—
A पहले हुआ, B बाद में।
कारणता पूछती है—
क्या A के कारण B हुआ?
यही दोनों के बीच का मूल अन्तर है।
किन्तु अब एक और गम्भीर प्रश्न सामने आता है।
यदि काल स्वयं घटनाओं के क्रम को निर्धारित करता है, तो क्या कारणता काल के भीतर ही सम्भव है?
और यदि हम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की बात करें—
तो क्या काल के आरम्भ से पहले किसी कारण की कल्पना सम्भव है?
यह प्रश्न अभी हमारे सामने खुला रहेगा।
क्योंकि “पहले” शब्द स्वयं काल से जुड़ा हुआ है।
यदि काल ही किसी बिन्दु पर आरम्भ हुआ, तो “काल से पहले” कहना शायद उसी प्रकार का विरोधाभास हो सकता है जैसे किसी सीमा के बाहर उस सीमा की इकाई से दूरी मापना।
इसलिए कारणता की खोज करते हुए मनुष्य को यह भी सावधान रहना होगा कि वह अपने सामान्य अनुभव की भाषा को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर बिना जाँच के लागू न कर दे।
“पहले” और “बाद” का अनुभव हमारे लिए स्वाभाविक है।
किन्तु कारणता का वास्तविक प्रश्न इससे कहीं गहरा है।
किसी घटना का पहले होना उसे कारण नहीं बनाता।
और—
किसी कारण और परिणाम के बीच कालिक सम्बन्ध होना कारणता की पूरी व्याख्या नहीं है।
यहीं से कारणता का अध्ययन काल से आगे बढ़ता है।
अब हमें यह देखना होगा कि मनुष्य ने स्वयं ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और व्यवस्था को कारण के प्रश्न से कैसे जोड़ा।
क्या सृष्टि का कोई कारण है?
क्या व्यवस्था के पीछे कोई मूल सिद्धान्त है?
क्या “उत्पत्ति” का अर्थ ही किसी कारण की उपस्थिति मानता है?
अगले भाग में हम इसी प्रश्न के साथ वैदिक और उपनिषदिक चिन्तन की ओर प्रवेश करेंगे।
मुख्य विवाद: क्या कारणता कालिक क्रम पर निर्भर है, या कारणात्मक सम्बन्ध को काल से स्वतंत्र किसी गहरे प्रभाव-सम्बन्ध के रूप में समझा जा सकता है?
आज की शोध-स्थिति: आधुनिक विज्ञान कालिक क्रम और कारणात्मक सम्बन्ध को अलग-अलग विश्लेषित करता है; किसी घटना का पहले होना कारणता का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जाता।
अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि काल स्वयं किसी ब्रह्माण्डीय संरचना का हिस्सा है, तो “काल से पहले कारण” कहने का वास्तविक अर्थ क्या हो सकता है?
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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