चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–6 : भारतीय दर्शनों में कारणता

 

चिंतन — अध्याय–16 : कारणता क्या है? — भाग–6 : भारतीय दर्शनों में कारणता

वैदिक और उपनिषदिक चिन्तन ने कारणता के प्रश्न को सृष्टि और अस्तित्व के मूल तक पहुँचाया था।

अब भारतीय दर्शन के सामने एक अधिक विशिष्ट प्रश्न था—

कारण और कार्य का वास्तविक सम्बन्ध क्या है?

यदि कोई वस्तु किसी कारण से उत्पन्न होती है, तो उस उत्पत्ति का अर्थ क्या है?

क्या कार्य कारण में पहले से उपस्थित था?

क्या कार्य बिल्कुल नया उत्पन्न होता है?

क्या कारण और कार्य दो अलग-अलग वास्तविकताएँ हैं?

या कारण ही किसी दूसरे रूप में कार्य के रूप में दिखाई देता है?

भारतीय दर्शनों ने इन प्रश्नों का एक ही उत्तर नहीं दिया। यही भारतीय दार्शनिक परम्परा की विशेषता है। कारणता के प्रश्न पर विभिन्न दर्शनों ने अपने-अपने मूल तत्त्वज्ञान के आधार पर अलग-अलग दृष्टियाँ विकसित कीं।

इसलिए भारतीय दर्शन में कारणता का अध्ययन किसी एक सिद्धान्त को “भारतीय उत्तर” मान लेने का विषय नहीं है।

यह विभिन्न दार्शनिक दृष्टियों के बीच एक गम्भीर संवाद है।

सांख्य दर्शन कारणता को समझने के लिए सत्कार्यवाद (Satkāryavāda) का समर्थन करता है।

इसके अनुसार कार्य अपने कारण में किसी रूप में पूर्वस्थित रहता है।

दूध से दही बनता है।

बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है।

यहाँ कार्य बिल्कुल शून्य से उत्पन्न नहीं होता।

कारण में कार्य की सम्भावना और आधार पहले से विद्यमान होते हैं।

सांख्य के लिए प्रकृति मूल कारण है और जगत् उसके विभिन्न परिणामों के रूप में विकसित होता है।

यहाँ परिवर्तन का अर्थ पूर्णतः नवीन वस्तु का शून्य से जन्म लेना नहीं है।

बल्कि कारण में स्थित शक्तियों और तत्त्वों का क्रमिक विकास है।

किन्तु यह प्रश्न यहाँ भी बना रहता है—

यदि कार्य कारण में पहले से उपस्थित है, तो उत्पत्ति को “उत्पत्ति” क्यों कहा जाए?

सांख्य का उत्तर परिवर्तन की प्रक्रिया में निहित है।

कारण और कार्य एक ही स्तर पर दिखाई नहीं देते।

कारण की एक अवस्था दूसरे रूप में विकसित होती है।

इसलिए कारणता यहाँ विकास और परिणाम का सम्बन्ध बन जाती है।

इसके विपरीत न्याय–वैशेषिक दर्शन कारणता को अधिक तार्किक और विश्लेषणात्मक ढंग से समझने का प्रयास करता है।

न्याय के लिए यह आवश्यक है कि कारण और कार्य के बीच एक निश्चित सम्बन्ध को पहचाना जाए।

कारण वह है जो कार्य की उत्पत्ति में आवश्यक भूमिका निभाता है।

किन्तु न्याय केवल “कारण” शब्द का सामान्य प्रयोग करके संतुष्ट नहीं होता।

वह पूछता है—

किस प्रकार का कारण?

यहीं न्याय–वैशेषिक में कारणों के विभिन्न प्रकारों का विश्लेषण मिलता है।

समवायी कारण (Inherent Cause) वह है जो कार्य में आन्तरिक रूप से उपस्थित रहता है।

घड़े के लिए मिट्टी का सम्बन्ध इसी प्रकार समझा जाता है।

असमवायी कारण (Non-inherent Cause) वह कारण है जो समवायी कारण के गुण या संरचना से सम्बन्धित होता है।

और निमित्त कारण (Efficient Cause) वह है जो कार्य की उत्पत्ति की प्रक्रिया को सक्रिय करता है।

कुम्हार, चाक और निर्माण की प्रक्रिया इस उदाहरण को समझने में सहायक हो सकती है।

यहाँ न्याय का महत्त्व इस बात में है कि उसने कारणता को केवल एक सामान्य “कारण” के रूप में नहीं देखा।

उसने पूछा—

किस कारण की कौन-सी भूमिका है?

यहीं कारणता एक अधिक सूक्ष्म तार्किक संरचना प्राप्त करती है।

मीमांसा दर्शन कारणता को कर्म और वैदिक क्रिया के प्रश्न से जोड़ता है।

यहाँ प्रश्न केवल भौतिक वस्तुओं की उत्पत्ति का नहीं है।

प्रश्न यह भी है कि—

किसी क्रिया का फल किस प्रकार उत्पन्न होता है?

मीमांसा के भीतर कर्म और उसके परिणाम के बीच सम्बन्ध को समझाने के लिए अदृष्ट (Adṛṣṭa) जैसी धारणा महत्त्वपूर्ण बनती है।

अदृष्ट का अर्थ किसी सरल, प्रत्यक्ष और तत्काल कारण से नहीं है।

यह उस अदृश्य कारणात्मक सम्बन्ध की ओर संकेत करता है जिसके माध्यम से क्रिया और फल के बीच सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।

यहाँ कारणता प्रत्यक्ष भौतिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर एक दार्शनिक समस्या बन जाती है।

क्योंकि प्रश्न यह है—

यदि कारण और परिणाम के बीच समय का अन्तर हो, तो उनके बीच सम्बन्ध कैसे बना रहता है?

यह प्रश्न आगे कर्म और कर्मफल के व्यापक दार्शनिक अध्ययन से जुड़ता है, किन्तु यहाँ हमारा केन्द्र केवल इतना है कि भारतीय चिन्तन ने कारणता को तत्काल और प्रत्यक्ष घटनाओं तक सीमित नहीं माना।

वेदान्त कारणता के प्रश्न को और अधिक मूलभूत स्तर पर ले जाता है।

यदि ब्रह्म जगत् का कारण है, तो ब्रह्म और जगत् के बीच सम्बन्ध कैसा है?

क्या ब्रह्म जगत् से अलग कोई कारण है?

क्या जगत् ब्रह्म से वास्तविक रूप से उत्पन्न हुआ है?

या कारण और कार्य का सम्बन्ध हमारी अनुभूति के स्तर पर ही दिखाई देता है?

वेदान्त की विभिन्न धाराएँ इन प्रश्नों के अलग-अलग उत्तर देती हैं।

यहीं कारणता केवल “किससे क्या उत्पन्न हुआ” का प्रश्न नहीं रहती।

वह यह प्रश्न बन जाती है—

क्या कारण और कार्य वास्तव में दो हैं?

भारतीय दर्शनों में कारणता के अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यही है कि उन्होंने कारणता को केवल भौतिक घटनाओं के क्रम के रूप में नहीं देखा।

उन्होंने उससे जुड़े मूल प्रश्नों को अलग-अलग स्तरों पर उठाया—

सांख्य ने पूछा—कार्य कारण में पहले से है या नहीं?

न्याय ने पूछा—कारण की वास्तविक भूमिका क्या है?

मीमांसा ने पूछा—क्रिया और फल के बीच सम्बन्ध कैसे स्थापित होता है?

वेदान्त ने पूछा—कारण और कार्य की अन्तिम वास्तविकता क्या है?

इन प्रश्नों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं बनाया जा सकता।

प्रत्येक दर्शन अपने विशिष्ट तत्त्वज्ञान के भीतर कारणता को समझता है।

यही कारण है कि भारतीय दर्शन में कारणता का कोई एक सार्वभौमिक भारतीय सिद्धान्त नहीं मिलता।

यहाँ अनेक दृष्टियाँ हैं।

और इन दृष्टियों के बीच का मतभेद ही भारतीय दार्शनिक चिन्तन को गहराई देता है।

किन्तु अब तक एक मूल प्रश्न पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है।

यदि कार्य कारण में पहले से उपस्थित है, तो कार्य की उत्पत्ति का अर्थ क्या है?

और यदि कार्य कारण में पहले से नहीं था, तो वह उत्पन्न कैसे हुआ?

यहीं से भारतीय दर्शन में सत्कार्यवाद, असत्कार्यवाद और विवर्तवाद का गम्भीर विवाद आरम्भ होता है।

मुख्य विवाद: क्या भारतीय दर्शनों में कारणता को एक ही सिद्धान्त से समझा जा सकता है, या प्रत्येक दर्शन अपने मूल तत्त्वज्ञान के अनुसार कारण–कार्य सम्बन्ध की स्वतंत्र व्याख्या करता है?

आज की शोध-स्थिति: भारतीय कारणता-विचार का अध्ययन सांख्य, न्याय–वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त की स्वतंत्र दार्शनिक संरचनाओं के भीतर किया जाता है; इन सभी को आधुनिक वैज्ञानिक causality का प्रत्यक्ष समकक्ष नहीं माना जाता।

अब भी अनुत्तरित प्रश्न: यदि कार्य कारण में पहले से उपस्थित है, तो “उत्पत्ति” का वास्तविक अर्थ क्या है—नया जन्म, परिवर्तन, विकास या केवल किसी पूर्वस्थित सम्भावना का प्रकट होना?


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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