ग्रंथ–२ : ब्रह्माण्ड | भाग–3 : चेतना की अवधारणा का ऐतिहासिक विकास

 ग्रंथ : ब्रह्माण्ड | अस्तित्व, चेतना और वास्तविकता का दार्शनिक अध्ययन | फ़ाइल–010 | अध्याय–10 : चेतना क्या है? | भाग–3 : चेतना की अवधारणा का ऐतिहासिक विकास


भाग–3 : चेतना की अवधारणा का ऐतिहासिक विकास 

(Historical Development of the Idea of Consciousness)

चेतना का प्रश्न उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं मानव का आत्मबोध। जिस दिन मनुष्य ने केवल संसार को देखना ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी देखना प्रारम्भ किया, उसी दिन चेतना का इतिहास आरम्भ हो गया। यह इतिहास किसी एक सभ्यता, धर्म या दर्शन का इतिहास नहीं है; यह मानव-बुद्धि की उस सतत यात्रा का इतिहास है जिसमें उसने बार-बार यह समझने का प्रयास किया कि अनुभव करने वाला वास्तव में कौन है।

मानव सभ्यता के विकास के साथ चेतना की अवधारणा भी निरन्तर परिवर्तित होती रही। कभी इसे जीवन-शक्ति माना गया, कभी आत्मा का स्वरूप, कभी ईश्वर का प्रकाश, कभी मन की क्रिया, और आधुनिक युग में कभी मस्तिष्क की जैविक प्रक्रिया। इन विविध व्याख्याओं के पीछे केवल मतभेद नहीं हैं; वे मनुष्य की बदलती हुई ज्ञान-पद्धतियों (Epistemologies), अस्तित्व-दृष्टियों (Ontologies) और अनुसंधान-पद्धतियों (Methodologies) का भी परिचय देती हैं।

इसी कारण चेतना के इतिहास का अध्ययन केवल विचारों का इतिहास नहीं, बल्कि मानव-चिन्तन के विकास का इतिहास भी है।

प्रारम्भिक मानव और चेतना का अनुभव

आदिम मानव ने चेतना का अध्ययन किसी सिद्धान्त के रूप में नहीं किया। उसने उसे जीवन के अनुभवों में पहचाना। जागरण और निद्रा, जन्म और मृत्यु, स्वप्न और स्मृति, भय और आश्चर्यइन सबने उसके भीतर यह प्रश्न उत्पन्न किया कि जीवन को संचालित करने वाली वह शक्ति क्या है जो कभी उपस्थित रहती है और कभी अनुपस्थित प्रतीत होती है।

मृत्यु ने इस प्रश्न को और गहरा किया। जीवित शरीर और मृत शरीर में भौतिक रूप से बहुत कम अन्तर दिखाई देता था, फिर भी दोनों के बीच कुछ ऐसा था जो निर्णायक था। यही अनुभव आगे चलकर अनेक सभ्यताओं में आत्मा, प्राण, जीव या जीवन-तत्त्व जैसी अवधारणाओं का आधार बना।

वैदिक दृष्टि : चेतना का ब्रह्माण्डीय परिप्रेक्ष्य

भारतीय बौद्धिक परम्परा में चेतना का प्रश्न अत्यन्त प्रारम्भिक काल से ही केवल मनोवैज्ञानिक विषय नहीं रहा। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में प्रत्यक्ष रूप से "चेतना" शब्द का व्यवस्थित दार्शनिक प्रयोग नहीं मिलता, किन्तु अस्तित्व, ऋत (ta), प्राण, मन, वाक् और ब्रह्म की जिन अवधारणाओं का विकास होता है, वे आगे चलकर चेतना-विमर्श की आधारभूमि बनती हैं।

ब्राह्मण-ग्रन्थों और आरण्यकों में यह विमर्श अधिक गम्भीर होता है और उपनिषदों में पहुँचकर चेतना भारतीय दर्शन के केन्द्रीय प्रश्नों में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ पहली बार यह प्रश्न केवल इतना नहीं रह जाता कि "मनुष्य चेतन कैसे है?" बल्कि यह भी पूछा जाता है कि "क्या सम्पूर्ण अस्तित्व का मूल स्वरूप ही चेतना है?"

यही वह बौद्धिक परिवर्तन है जिसने भारतीय दर्शन को विश्व-दर्शन में एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया।

उपनिषद : आत्मानुभूति से ब्रह्मविद्या तक

उपनिषदों में चेतना का अध्ययन बाह्य जगत से अधिक आन्तरिक अनुभव के आधार पर विकसित होता है। ऋषि प्रकृति का निरीक्षण अवश्य करते हैं, किन्तु उनका मुख्य प्रश्न अनुभवकर्ता की सत्ता है।

वे पूछते हैं

कौन देखता है?

कौन सुनता है?

कौन जानता है?

और जो इन सबको जानता है, क्या उसे भी जाना जा सकता है?

इन प्रश्नों के उत्तर में उपनिषद अनेक महावाक्यों और दार्शनिक प्रतिपादनों का विकास करते हैं। किन्तु उन महावाक्यों का विस्तृत विवेचन इस अध्याय के आगामी भागों में किया जाएगा। यहाँ इतना समझ लेना पर्याप्त है कि उपनिषदों ने चेतना को केवल मन की क्रिया मानकर अस्तित्व के मूल प्रश्न के रूप में स्थापित किया।

श्रमण परम्पराएँ : वैकल्पिक दृष्टियों का उदय

भारतीय चिन्तन केवल वैदिक परम्परा तक सीमित नहीं रहा। बौद्ध और जैन परम्पराओं ने चेतना के सम्बन्ध में अनेक मौलिक प्रश्न उठाए।

बौद्ध दर्शन ने स्थायी आत्मा की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाया और चेतना को क्षणिक प्रवाह (Stream of Consciousness) के रूप में समझने का प्रयास किया। दूसरी ओर जैन दर्शन ने प्रत्येक जीव में चेतना को उसकी मौलिक विशेषता माना और चेतना के आवरण तथा उसके शुद्धीकरण का विस्तृत सिद्धान्त विकसित किया।

इन दोनों परम्पराओं ने भारतीय चेतना-विमर्श को अत्यन्त समृद्ध बनाया। उनके विचारों का विस्तृत अध्ययन आगे पृथक् अनुभागों में किया जाएगा।

यूनानी दर्शन : तर्क और आत्मा

भारत के समानान्तर यूनानी दर्शन में भी मन, आत्मा और ज्ञान पर गम्भीर चिन्तन विकसित हुआ। सुकरात ने आत्म-परीक्षण को ज्ञान का आधार बनाया। प्लेटो ने आत्मा की अमरता और ज्ञान की प्रकृति पर विचार किया। अरस्तू ने जीवित प्राणियों की आत्मा का वर्गीकरण प्रस्तुत किया और मन तथा ज्ञान की संरचना पर व्यवस्थित विवेचन किया।

यद्यपि यूनानी और भारतीय परम्पराओं की पद्धतियाँ भिन्न थीं, फिर भी दोनों के सामने एक समान प्रश्न उपस्थित थाअनुभव और ज्ञान का वास्तविक आधार क्या है?

मध्यकाल से आधुनिक युग तक

मध्यकालीन धार्मिक परम्पराओं में चेतना का प्रश्न प्रायः आत्मा और ईश्वर के सम्बन्ध में समझा गया। किन्तु आधुनिक युग में विज्ञान के उदय के साथ अध्ययन की दिशा बदलने लगी।

रेने देकार्त (René Descartes) ने मन और शरीर के सम्बन्ध को दर्शन का केन्द्रीय प्रश्न बनाया। जॉन लॉक, डेविड ह्यूम और इमानुएल कांट ने ज्ञान, अनुभव और आत्मबोध के नये प्रतिमान प्रस्तुत किए। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान और संज्ञान-विज्ञान के विकास ने चेतना को प्रयोगशाला के अध्ययन का विषय भी बना दिया।

फिर भी मूल प्रश्न बना रहा

क्या मस्तिष्क चेतना को उत्पन्न करता है, या केवल उसके प्रकट होने का माध्यम है?

समकालीन स्थिति

आज चेतना का अध्ययन दर्शन, तंत्रिका-विज्ञान, मनोविज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, संज्ञान-विज्ञान और भौतिकीसभी के संयुक्त विमर्श का विषय बन चुका है। आधुनिक विज्ञान ने मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के विषय में अभूतपूर्व प्रगति की है, किन्तु अनुभव की आत्मगत प्रकृति अभी भी उसके सामने एक खुली चुनौती बनी हुई है।

इसी कारण आज चेतना पर चर्चा केवल प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि दार्शनिक सम्मेलनों, संज्ञान-विज्ञान के शोध-केंद्रों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास से जुड़े वैश्विक विमर्शों में भी समान रूप से हो रही है।

ऐतिहासिक यात्रा से प्राप्त संकेत

इतिहास का अध्ययन हमें यह नहीं बताता कि चेतना का अंतिम उत्तर क्या है; वह केवल यह दिखाता है कि मानव ने इस प्रश्न को किस-किस प्रकार से समझने का प्रयास किया है।

यही इतिहास हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है

चेतना की समस्या किसी एक अनुशासन की समस्या नहीं है।

यह दर्शन का भी प्रश्न है।

यह विज्ञान का भी प्रश्न है।

यह मनोविज्ञान का भी प्रश्न है।

यह अध्यात्म का भी प्रश्न है।

और अन्ततः यह स्वयं मनुष्य के आत्मबोध का प्रश्न है।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर अब हम अगले भाग में प्रवेश करेंगे, जहाँ भारतीय दार्शनिक परम्पराओं में चेतना की अवधारणा का क्रमबद्ध अध्ययन प्रारम्भ करेंगे। सबसे पहले हम वैदिक साहित्य में चेतना के प्रारम्भिक संकेतों और उनके दार्शनिक विकास को समझेंगे, क्योंकि यहीं से ब्रह्माण्डीय चेतना की भारतीय अवधारणा का मूल बीजारोपण होता है।

 मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )


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