चिन्तन - भाग–6 : वेदान्त में चेतना — अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत

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भाग–6 : वेदान्त में चेतनाअद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत

(Consciousness in Vedānta: Advaita, Viśiṣādvaita and Dvaita)

उपनिषदों ने आत्मा, ब्रह्म और प्रज्ञान के सम्बन्ध में जिन मूल प्रश्नों को स्थापित किया, वे स्वयं अंतिम दार्शनिक प्रणाली के रूप में प्रस्तुत नहीं किए गए। उपनिषदों की भाषा प्रायः सूत्रात्मक, सांकेतिक और संवादात्मक है। उनके अनेक वाक्य इतने गहन और बहुअर्थी हैं कि विभिन्न आचार्यों ने उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार से समझा और उनके आधार पर अपने-अपने दार्शनिक तंत्र (Philosophical Systems) विकसित किए।

इसी प्रक्रिया का परिपक्व रूप हैवेदान्त (Vedānta)

वेदान्त कोई एक मत नहीं है। यह उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीताइन तीन आधारग्रन्थों (प्रस्थानत्रयी) पर आधारित अनेक दार्शनिक परम्पराओं का सामूहिक नाम है। इन सभी परम्पराओं का उद्देश्य उपनिषदों की शिक्षाओं की व्याख्या करना है, किन्तु चेतना, आत्मा, जीव और ब्रह्म के सम्बन्ध में उनके निष्कर्ष एक समान नहीं हैं।

यही विविधता वेदान्त को भारतीय दर्शन का सबसे समृद्ध और सबसे व्यापक विमर्श बनाती है।

 

वेदान्त का मूल प्रश्न

वेदान्त का केन्द्रीय प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य सोचता कैसे है या अनुभव कैसे करता है। उसका मूल प्रश्न इससे कहीं अधिक गहरा है

जो अनुभव करता है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है?

क्या वह आत्मा है?

क्या आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं?

यदि दोनों एक हैं, तो अनेकता का अनुभव क्यों होता है?

यदि दोनों भिन्न हैं, तो उनका सम्बन्ध क्या है?

और यदि जीव सीमित है, तो वह अनन्त सत्य का अनुभव कैसे कर सकता है?

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में वेदान्त की विभिन्न शाखाएँ विकसित हुईं।

 

1. अद्वैत वेदान्त : चेतना ही परम सत्य

आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त (Advaita Vedānta) भारतीय दर्शन की सर्वाधिक प्रभावशाली परम्पराओं में से एक है।

अद्वैत का मूल प्रतिपादन है

परम सत्य केवल ब्रह्म है।

ब्रह्म निरपेक्ष, निराकार, अनन्त और शुद्ध चैतन्य (Pure Consciousness) है।

जीव, जगत और ईश्वर का अनुभव अवश्य होता है, किन्तु परम दृष्टि (पारमार्थिक स्तर) से ब्रह्म ही एकमात्र अंतिम वास्तविकता है।

अद्वैत के अनुसार चेतना किसी वस्तु का गुण नहीं है।

चेतना स्वयं वह सत्ता है जिसके कारण समस्त अनुभव सम्भव होते हैं।

शरीर बदलता है, मन बदलता है, बुद्धि बदलती है, अहंकार भी बदलता है।

किन्तु इन सब परिवर्तनों का साक्षी चैतन्य स्वयं अपरिवर्तित रहता है।

इसी कारण अद्वैत में चेतना को उत्पन्न होने वाली घटना नहीं, बल्कि नित्य, स्वप्रकाश (Self-luminous) और स्वतःसिद्ध (Self-evident) वास्तविकता माना गया है।

 

माया और चेतना

अद्वैत वेदान्त का एक अत्यन्त चर्चित सिद्धान्त हैमाया।

माया का अर्थ केवल भ्रम (Illusion) नहीं है।

शंकराचार्य के अनुसार माया वह शक्ति है जिसके कारण एक ही ब्रह्म विविध नामों और रूपों में अनुभव होता है।

यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि माया का सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान के किसी सिद्धान्त का विकल्प नहीं है। यह अस्तित्व और अनुभव की व्याख्या का एक दार्शनिक प्रतिमान (Philosophical Model) है।

इसी प्रकार अद्वैत की चेतना भी तंत्रिका-विज्ञान की चेतना नहीं, बल्कि अस्तित्वमीमांसा (Ontology) की चेतना है।

 

विशिष्टाद्वैत : चेतना और ब्रह्म का अविभाज्य सम्बन्ध

आचार्य रामानुज द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैत वेदान्त (Viśiṣādvaita Vedānta) अद्वैत से भिन्न दिशा प्रस्तुत करता है।

रामानुज के अनुसार ब्रह्म एक है, किन्तु वह गुणों से रहित नहीं है।

जीव और जगत ब्रह्म से पूर्णतः पृथक भी नहीं हैं और पूर्णतः अभिन्न भी नहीं।

वे ब्रह्म के विशिष्ट स्वरूप (Qualified Reality) के अंग हैं।

इस दृष्टि से प्रत्येक जीव चेतन है, किन्तु उसकी चेतना परम चेतना पर आश्रित है।

यह सम्बन्ध शरीर और आत्मा के सम्बन्ध के समान समझाया गया हैभिन्न भी, किन्तु अविभाज्य रूप से सम्बद्ध।

यहाँ चेतना व्यक्तिगत भी है और परम सत्ता से सम्बद्ध भी।

 

द्वैत वेदान्त : जीव और ब्रह्म का वास्तविक भेद

आचार्य मध्व द्वारा प्रतिपादित द्वैत वेदान्त (Dvaita Vedānta) चेतना की एक भिन्न व्याख्या प्रस्तुत करता है।

द्वैत के अनुसारजीव वास्तविक है। ब्रह्म वास्तविक है। जगत भी वास्तविक है।

किन्तु इन तीनों के बीच वास्तविक भेद है।

जीव चेतन है, परन्तु उसकी चेतना परमात्मा की चेतना से भिन्न है।

जीव कभी भी ब्रह्म नहीं बनता।

उसका अस्तित्व शाश्वत है, किन्तु वह सदैव परम सत्ता पर आश्रित रहता है।

इस प्रकार द्वैत चेतना की व्यक्तिगत सत्ता को अद्वैत की अपेक्षा अधिक स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है।

 

अन्य वेदान्त परम्पराएँ

वेदान्त का विकास केवल इन तीन मतों तक सीमित नहीं है।

निम्बार्क का द्वैताद्वैत,

वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत,

श्रीकण्ठ का शैव-विशिष्टाद्वैत,

बलदेव विद्याभूषण का अचिन्त्य भेदाभेद

इन सभी ने चेतना, जीव और ब्रह्म के सम्बन्ध की अपनी विशिष्ट व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं।

यद्यपि उनके सिद्धान्तों में भिन्नताएँ हैं, फिर भी सभी इस प्रश्न के इर्द-गिर्द केन्द्रित हैं कि चेतना का अंतिम आधार क्या है और जीव का परम वास्तविकता से क्या सम्बन्ध है।

 

तुलनात्मक अवलोकन

यदि इन प्रमुख वेदान्त परम्पराओं की तुलना की जाए, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है।

अद्वैत कहता है

चेतना ही परम वास्तविकता है।

विशिष्टाद्वैत कहता है

चेतना परम वास्तविकता से अविभाज्य सम्बन्ध रखती है।

द्वैत कहता है

चेतना जीव का वास्तविक गुण है, किन्तु जीव और परमात्मा सदा भिन्न हैं।

अर्थात् तीनों परम्पराएँ चेतना को स्वीकार करती हैं, किन्तु उसके अस्तित्वगत स्वरूप (Ontological Status) और उसके अंतिम आधार के सम्बन्ध में उनके निष्कर्ष भिन्न हैं।

 दार्शनिक महत्त्व

वेदान्त का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने चेतना को केवल मनोवैज्ञानिक अनुभव का विषय नहीं रहने दिया।

उसने चेतना को अस्तित्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा और मोक्षमीमांसातीनों के केन्द्र में स्थापित किया।

यही कारण है कि वेदान्त में चेतना का अध्ययन केवल यह जानने के लिए नहीं किया जाता कि मनुष्य कैसे सोचता है, बल्कि यह जानने के लिए किया जाता है कि मनुष्य वास्तव में है क्या।

आगे की दिशा

यद्यपि वेदान्त ने चेतना का अत्यन्त व्यापक और गहन विवेचन प्रस्तुत किया, किन्तु भारतीय दर्शन की सभी परम्पराएँ उसके निष्कर्षों से सहमत नहीं हैं।

विशेष रूप से सांख्य और योग दर्शन चेतना के प्रश्न को एक भिन्न दार्शनिक ढाँचे में समझाते हैं।

वे ब्रह्म की अपेक्षा पुरुष (Puruṣa) और प्रकृति (Prakti) की अवधारणाओं के माध्यम से चेतना की व्याख्या करते हैं।

 मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

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