चिंतन - क्या मनुष्य अपने भीतर जितना रिक्त होता जा रहा है, उतना ही बाहर भरता जा रहा है?

 चिंतन - क्या मनुष्य अपने भीतर जितना रिक्त होता जा रहा है, उतना ही बाहर भरता जा रहा है?

सभ्यता का इतिहास एक विचित्र विरोधाभास का इतिहास है। मनुष्य ने अपने घर बड़े कर लिए, पर भीतर का आँगन छोटा हो गया। उसने स्मृतियों को संग्रहित करने के लिए अनगिनत यंत्र बना लिए, पर स्वयं याद रखना भूलने लगा। उसने दुनिया को अपनी मुट्ठी में समेट लिया, पर अपने ही मन को थाम नहीं पाया।

तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या मनुष्य अपने भीतर जितना रिक्त होता जा रहा है, उतना ही बाहर भरता जा रहा है?

रिक्तता स्वयं में कोई दोष नहीं है।

बाँसुरी इसलिए गाती है कि वह भीतर से रिक्त है।

घड़ा इसलिए उपयोगी है कि उसके भीतर खाली स्थान है।

आकाश इसलिए अनंत है कि उसने स्वयं को किसी सीमा में नहीं बाँधा।

पर मनुष्य की आज की रिक्तता ऐसी नहीं है।

यह सृजन की रिक्तता नहीं।

यह विस्मृति की रिक्तता है।

हम अपने भीतर जो स्थान कभी मौन, ध्यान, आत्मसंवाद और संबंधों के लिए सुरक्षित रखते थे, वहाँ अब सूचनाएँ रहने लगी हैं।

हमारे पास समाचार अधिक हैं, समाचारों को समझने का समय कम।

हमारे पास परिचय अधिक हैं, आत्मीयता कम।

हमारे पास मनोरंजन अधिक है, आनंद कम।

हमारे पास शब्द अधिक हैं, संवाद कम।

मानो हमने जीवन को भरने की इतनी जल्दी की कि जीने के लिए कोई स्थान ही नहीं छोड़ा।

मुझे लगता है कि मनुष्य वस्तुओं का संग्रह इसलिए नहीं करता कि उसे उनकी आवश्यकता है।

वह इसलिए करता है क्योंकि वह अपने भीतर की किसी अनकही कमी को उनसे भरना चाहता है।

एक घर भरता है।

फिर दूसरा।

एक उपलब्धि मिलती है।

फिर दूसरी।

एक सम्मान मिलता है।

फिर अगला।

पर आश्चर्य यह है कि भीतर की रिक्तता उतनी ही बनी रहती है।

क्यों?

क्योंकि जो अभाव आत्मा का है, उसे वस्तुएँ कभी पूरा नहीं कर सकतीं।

प्यास का उपचार चित्रों से नहीं होता।

जल चाहिए।

उसी प्रकार चेतना की प्यास का उपचार सुविधाओं से नहीं होता।

उसे अर्थ चाहिए।

आज का मनुष्य पहले से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

पर क्या वह सचमुच जुड़ा है?

उसके हाथों में संसार है।

पर उसके हृदय में कितने लोग हैं?

उसके पास संवाद के अनगिनत माध्यम हैं।

पर कितनी बातचीत ऐसी है, जिसके बाद आत्मा हल्की हो जाए?

संभवतः यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है।

हम अकेले कम हुए हैं।

अकेलेपन में अधिक हो गए हैं।

भारतीय दर्शन में शून्य का विचार रिक्तता नहीं, पूर्णता का प्रतीक है।

क्योंकि जहाँ अहंकार रिक्त होता है, वहीं सत्य प्रवेश करता है।

जहाँ इच्छाओं का शोर कम होता है, वहीं शांति का संगीत सुनाई देता है।

पर आज हमने भीतर के शून्य को समझने के बजाय उससे डरना शुरू कर दिया है।

जैसे ही कुछ क्षण खाली मिलते हैं, हम उन्हें किसी न किसी ध्वनि से भर देते हैं।

हम मौन से बचते हैं।

क्योंकि मौन हमें स्वयं से मिलवा देता है।

और स्वयं से मिलना सबसे कठिन मुलाक़ात है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि मनुष्य बाहर जितना भर रहा है, उतना ही भीतर खो रहा है।

वह अपने कमरे सजा रहा है।

पर अपने विचारों को बिखरा छोड़ रहा है।

वह अपनी अलमारियाँ व्यवस्थित कर रहा है।

पर अपनी चेतना को अव्यवस्थित होने दे रहा है।

यह असंतुलन धीरे-धीरे जीवन को थका देता है।

अंततः मनुष्य को वस्तुओं की नहीं, उपस्थिति की आवश्यकता होती है।

कोई ऐसा व्यक्ति जो सुन सके।

कोई ऐसा क्षण जो शांत हो।

कोई ऐसी प्रार्थना जिसमें माँग न हो।

कोई ऐसा मौन जिसमें स्वयं की धड़कन सुनाई दे।

यही वे स्थान हैं, जहाँ भीतर का रिक्त स्थान फिर से जीवंत होने लगता है।

और तब समझ में आता है कि रिक्तता शत्रु नहीं थी।

हमने उसे गलत समझ लिया था।

वास्तविक समस्या रिक्त होना नहीं है।

वास्तविक समस्या यह है कि हमने उस रिक्तता को बाहरी वस्तुओं से भरने का प्रयास किया, जबकि उसे केवल चेतना ही भर सकती थी।

तभी लगता है—

मनुष्य बाहर जितना भरता जाता है, यदि भीतर उतना ही शांत न होता जाए, तो उसका संग्रह ही उसका बोझ बन जाता है।

क्योंकि अंततः जीवन इस बात से नहीं मापा जाएगा कि हमने कितना इकट्ठा किया।

बल्कि इस बात से कि हमने अपने भीतर कितना स्थान बचाए रखा—सत्य के लिए, प्रेम के लिए, मौन के लिए और स्वयं के लिए।

— मुकेश

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