काल सूक्त प्रथम मन्त्र : काल — ब्रह्माण्ड की गतिशील शक्ति -
प्रथम मन्त्र : काल — ब्रह्माण्ड की गतिशील शक्ति
मन्त्र
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः।
तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥
हिन्दी अर्थ
काल एक अश्व के समान निरन्तर गतिमान है। उसकी सात रश्मियाँ हैं। वह सहस्र नेत्रों वाला है। वह अजर है और अपार सृजन-शक्ति से सम्पन्न है।
ज्ञानी और दूरदर्शी पुरुष उस काल पर आरोहण करते हैं। उसके चक्र सम्पूर्ण भुवनों में गतिशील हैं।
वैज्ञानिक व्याख्या
ऋषि ने काल को अश्व कहा है।
यह उपमा अत्यन्त गहरी है। अश्व गति का प्रतीक है। वह ठहराव का नहीं, निरन्तर आगे बढ़ने का प्रतीक है। काल भी इसी प्रकार किसी एक स्थान पर रुकता नहीं। वह प्रत्येक वस्तु को परिवर्तन की दिशा में ले जाता है।
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से समय को किसी दिखाई देने वाली वस्तु के रूप में नहीं देखा जाता। हम समय को उसके प्रभावों से पहचानते हैं। पृथ्वी घूमती है। ऋतुएँ बदलती हैं। शरीर में परिवर्तन होता है। तारे जन्म लेते हैं और नष्ट होते हैं।
अर्थात् जहाँ परिवर्तन है, वहाँ समय की उपस्थिति है।
इस दृष्टि से काल स्वयं कोई घड़ी नहीं है। वह परिवर्तन के क्रम का आधार है। ऋषि का ‘अश्व’ इसी गतिशीलता का प्रतीक है।
मन्त्र में काल को “सप्तरश्मि” कहा गया है—सात रश्मियों वाला।
वेद में ‘सप्त’ केवल संख्या नहीं है। वह क्रम, विभाजन और पूर्णता का भी प्रतीक है। आधुनिक विज्ञान में प्रकाश के दृश्य वर्णक्रम के सात प्रमुख रंगों की चर्चा होती है। सूर्य का प्रकाश हमें विविध रूपों में दिखाई देता है।
किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकाश केवल सात रंगों तक सीमित नहीं है। विद्युत्चुम्बकीय वर्णक्रम का बहुत बड़ा भाग मानव आँख से दिखाई ही नहीं देता।
इसलिए ‘सप्तरश्मि’ को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते समय सावधानी आवश्यक है।
फिर भी इसका वैज्ञानिक संकेत अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
काल एकरूप होते हुए भी प्रकृति में अनेक रूपों से प्रकट होता है।
दिन और रात।
ऋतु और परिवर्तन।
जन्म और विकास।
सृजन और क्षय।
प्रकृति की ये सभी गतियाँ काल की अलग-अलग रश्मियों के समान दिखाई देती हैं।
इसके बाद काल को कहा गया है—“सहस्राक्ष”।
सहस्र नेत्रों वाला।
मनुष्य की दृष्टि सीमित है। वह एक समय में बहुत थोड़ी घटनाओं को देख सकता है। लेकिन ब्रह्माण्ड में एक ही क्षण में असंख्य घटनाएँ घट रही होती हैं।
कहीं कोई तारा जन्म ले रहा है।
कहीं कोई तारा अपने अन्त की ओर बढ़ रहा है।
कहीं कोशिका विभाजित हो रही है।
कहीं कोई जीव अपनी जीवन-यात्रा पूरी कर रहा है।
समय की प्रक्रिया में ये सभी घटनाएँ एक साथ घटित होती हैं।
इसलिए ‘सहस्राक्ष’ को काल की बहुस्तरीय और सर्वव्यापी गति का प्रतीक कहा जा सकता है।
आधुनिक भौतिकी ने भी समय को एक सरल और सभी के लिए समान अनुभव के रूप में स्वीकार नहीं किया। गति और गुरुत्वाकर्षण की परिस्थितियाँ समय के अनुभव को प्रभावित कर सकती हैं।
समय का वैज्ञानिक स्वरूप हमारी सामान्य अनुभूति से कहीं अधिक जटिल है।
ऋषि ने इसी रहस्यमय व्यापकता को सहस्र नेत्रों के प्रतीक में देखा।
काल को मन्त्र “अजर” कहता है।
वस्तुएँ पुरानी होती हैं। शरीर बूढ़े होते हैं। पर्वत क्षीण होते हैं। तारे भी अपने जीवन-चक्र से गुजरते हैं।
लेकिन काल स्वयं बूढ़ा नहीं होता।
यहाँ ‘अजर’ का अर्थ यह नहीं है कि समय कोई जीवित शरीर है। इसका संकेत यह है कि काल स्वयं उस सामान्य क्षय का विषय नहीं है, जिसके भीतर अन्य वस्तुएँ बदलती हैं।
जीव काल में बूढ़ा होता है।
काल बूढ़ा नहीं होता।
इसीलिए ऋषि उसे अजर कहते हैं।
इसके बाद आता है—“भूरिरेताः”।
काल को अपार सृजन-शक्ति से सम्पन्न कहा गया है।
आधुनिक विज्ञान हमें बताता है कि ब्रह्माण्ड का वर्तमान स्वरूप एक अत्यन्त दीर्घकालिक विकास-क्रम का परिणाम है। तारों का निर्माण हुआ। तारों के भीतर तत्व बने। ग्रह बने। पृथ्वी पर रासायनिक प्रक्रियाएँ विकसित हुईं। फिर जीवन का क्रम आगे बढ़ा।
हमारे शरीर में उपस्थित अनेक तत्वों का इतिहास तारों तक जाता है।
अर्थात् काल केवल विनाश का माध्यम नहीं है।
काल सृजन का भी महान क्षेत्र है।
अरबों वर्षों की काल-यात्रा ने ब्रह्माण्ड को उसके वर्तमान रूप तक पहुँचाया है। इस दृष्टि से ‘भूरिरेता’ काल की उस अपार शक्ति का संकेत है, जिसके भीतर सृजन की अनन्त सम्भावनाएँ विकसित होती हैं।
मन्त्र कहता है—
“तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितः।”
ज्ञानी और दूरदर्शी पुरुष उस पर आरोहण करते हैं।
काल पर चढ़ना कोई भौतिक क्रिया नहीं है।
मनुष्य समय को रोक नहीं सकता। वह समय से बाहर भी नहीं जा सकता। लेकिन वह समय को समझने का प्रयास कर सकता है।
वह अतीत का अध्ययन करता है।
वर्तमान का निरीक्षण करता है।
और भविष्य की सम्भावनाओं का अनुमान लगाता है।
यही मनुष्य की विशिष्ट बौद्धिक शक्ति है।
एक सामान्य जीव समय को केवल जीता है।
मनुष्य समय को मापता है।
फिर उसका अध्ययन करता है।
फिर उसके नियमों को समझने का प्रयास करता है।
इस अर्थ में ‘कवि’ और ‘विपश्चित्’ वे लोग हैं, जो काल के प्रवाह में केवल बहते नहीं, बल्कि काल की गति को देखने और समझने का विवेक विकसित करते हैं।
अन्तिम पंक्ति कहती है—
“तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा।”
उस काल के चक्र सम्पूर्ण भुवनों में हैं।
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड में चक्र सर्वत्र दिखाई देते हैं।
पृथ्वी का घूर्णन।
पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर गति।
ऋतु-चक्र।
जल-चक्र।
कार्बन-चक्र।
तारों का जीवन-चक्र।
ग्रहों की कक्षाएँ।
जीवन और पदार्थ की परिवर्तनशील प्रक्रियाएँ।
ब्रह्माण्ड में कोई भी वस्तु पूर्ण स्थिरता में नहीं है।
इसलिए काल के चक्रों का ‘सम्पूर्ण भुवनों में होना’ आधुनिक भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है कि समय और परिवर्तन की प्रक्रियाएँ ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्तर पर सक्रिय हैं।
परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक।
कोशिका से लेकर जीव-जगत तक।
मनुष्य के जन्म से लेकर तारों की मृत्यु तक।
सब कुछ काल के भीतर घटित हो रहा है।
इस मन्त्र में ऋषि काल को केवल घड़ी के समय के रूप में नहीं देखते।
काल यहाँ एक सार्वभौमिक गतिशील व्यवस्था है।
वह गति है।
वह परिवर्तन है।
वह सृजन और क्षय के बीच का सम्बन्ध है।
और वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक अदृश्य क्रम में गतिमान रखता है।
आधुनिक विज्ञान समय को गणितीय समीकरणों और भौतिक नियमों के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।
ऋषि उसी रहस्य को अश्व, रश्मि, नेत्र और चक्र के प्रतीकों में देखते हैं।
भाषा अलग है।
दृष्टिकोण अलग है।
लेकिन प्रश्न एक ही है—
यह निरन्तर परिवर्तन किस व्यवस्था के भीतर घटित हो रहा है?
विज्ञान उसे समय कहता है।
ऋषि उसे काल कहते हैं।
और इस मन्त्र में काल केवल समय नहीं रहता।
वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गति देने वाली अदृश्य व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है।
— मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग धारक के मौलिक विचार एवं शोध-आधारित लेखन हैं।)
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