दर्शन - भाग–०३ | दर्शन क्या है? | मनुष्य और अस्तित्व का प्रश्न

  दर्शन -अध्याय–०१ | भाग–०३ | दर्शन क्या है? | मनुष्य और अस्तित्व का प्रश्न

मनुष्य के अधिकांश प्रश्न बाहर से प्रारम्भ होते हैं। वह आकाश को देखता है और आकाश के बारे में पूछता है। वह प्रकृति को देखता है और उसके नियमों को समझना चाहता है। वह समाज को देखता है और उसके संगठन पर विचार करता है। लेकिन दर्शन की यात्रा धीरे-धीरे एक ऐसे बिन्दु पर पहुँचती है जहाँ प्रश्न बाहर से लौटकर स्वयं मनुष्य के सामने खड़ा हो जाता है—“मैं कौन हूँ?”

यह प्रश्न साधारण प्रतीत हो सकता है, लेकिन वास्तव में यह दर्शन के सबसे गहरे प्रश्नों में से एक है। क्योंकि यहाँ मनुष्य किसी बाहरी वस्तु का अध्ययन नहीं कर रहा। वह स्वयं को ही अध्ययन का विषय बना रहा है।

विज्ञान मनुष्य के शरीर का अध्ययन कर सकता है। मनोविज्ञान उसके व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन कर सकता है। समाजशास्त्र उसे सामाजिक सम्बन्धों के भीतर देख सकता है।

लेकिन दर्शन पूछता है—“इन सबके पीछे मनुष्य होने का अर्थ क्या है?”

यहीं दर्शन अस्तित्व के प्रश्न से जुड़ता है।

अस्तित्व का अर्थ

“अस्तित्व” शब्द सुनते ही सामान्यतः हमारे सामने किसी वस्तु के होने का विचार आता है। कोई वस्तु है या नहीं है—यह अस्तित्व का सबसे सरल रूप है।

लेकिन मनुष्य के लिए अस्तित्व केवल “होने” का प्रश्न नहीं है।

मनुष्य यह भी पूछता है— “मैं क्यों हूँ?”

यह प्रश्न “मैं कैसे बना?” से अलग है।

जीवविज्ञान मनुष्य के विकास की प्रक्रिया पर विचार कर सकता है। इतिहास मानव सभ्यता के विकास का अध्ययन कर सकता है। लेकिन “मेरे होने का अर्थ क्या है?”—यह प्रश्न एक अलग दिशा में जाता है।

यहीं दर्शन की आवश्यकता दिखाई देती है।

मनुष्य अपने अस्तित्व को केवल स्वीकार नहीं करता। वह उसे समझना चाहता है। और कभी-कभी वह अपने अस्तित्व से असन्तुष्ट भी होता है। 

वह पूछता है—क्या मेरा जीवन केवल घटनाओं का क्रम है? क्या मैं केवल शरीर हूँ? क्या मेरी चेतना मेरी पहचान है? क्या मेरे निर्णय वास्तव में मेरे हैं?

इन प्रश्नों का कोई सरल उत्तर नहीं है।

लेकिन दर्शन का महत्व इसी में है कि वह इन प्रश्नों को दबाता नहीं।

मनुष्य और मृत्यु

मनुष्य के अस्तित्वगत प्रश्नों में मृत्यु का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

अन्य जीव भी मरते हैं। लेकिन मनुष्य मृत्यु को केवल घटित होते हुए नहीं देखता; वह अपनी मृत्यु की सम्भावना को पहले से जानता है।

यही ज्ञान उसके जीवन को बदल देता है।

मनुष्य जानता है कि वह मरेगा, फिर भी वह जीता है। वह भविष्य की योजनाएँ बनाता है, सम्बन्ध बनाता है, ज्ञान अर्जित करता है और अपने पीछे कुछ छोड़ने की इच्छा रखता है।

यहाँ एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है।

मनुष्य अपने जीवन की सीमितता को जानता है, लेकिन फिर भी वह अर्थ की खोज करता है।

दर्शन इसी विरोधाभास को देखता है।

यदि जीवन सीमित है, तो अर्थ कहाँ से आता है?

क्या अर्थ किसी बाहरी सत्ता द्वारा दिया जाता है?

क्या मनुष्य स्वयं अर्थ बनाता है?

क्या अर्थ का प्रश्न ही मनुष्य की एक मानसिक रचना है?

या क्या मनुष्य के अस्तित्व में अर्थ की कोई वास्तविक सम्भावना है?

विभिन्न दर्शनों ने इन प्रश्नों के अलग-अलग उत्तर दिए हैं। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि मृत्यु ने मनुष्य को केवल भयभीत नहीं किया; उसने उसे विचार करने के लिए भी बाध्य किया।

क्या मृत्यु दर्शन की गुरु है?

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि दर्शन केवल मृत्यु से जन्मा। फिर भी मृत्यु ने मनुष्य की दार्शनिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया है।

मृत्यु मनुष्य को उसकी सीमितता का बोध कराती है।

वह बताती है कि शरीर परिवर्तनशील है। समय सीमित है। जीवन स्थायी नहीं है।

लेकिन मृत्यु का प्रश्न केवल जीवन के अन्त का प्रश्न नहीं है। वह जीवन के अर्थ का प्रश्न भी बन जाता है।

यदि मनुष्य अमर होता, तो क्या वह उसी प्रकार अर्थ की खोज करता?

यह एक काल्पनिक प्रश्न है, लेकिन दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण है।

संभव है कि मृत्यु का ज्ञान ही मनुष्य को अपने जीवन को मूल्य देने के लिए प्रेरित करता हो। यह भी सम्भव है कि मृत्यु का भय मनुष्य को धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक प्रणालियों की ओर ले गया हो।

लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है।

किसी एक कारण से समस्त दर्शन की उत्पत्ति समझाना उचित नहीं होगा।

इतिहास में विभिन्न सभ्यताओं ने मृत्यु को अलग-अलग रूपों में समझा। कहीं वह पुनर्जन्म के प्रश्न से जुड़ी, कहीं आत्मा की अमरता से, कहीं मुक्ति से और कहीं अस्तित्वगत निरर्थकता से।

इसलिए मृत्यु दर्शन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, लेकिन दर्शन केवल मृत्यु का उत्तर नहीं है।

दर्शन और अर्थ की खोज

मनुष्य के भीतर अर्थ की खोज एक विशेष मानवीय प्रवृत्ति प्रतीत होती है।

मनुष्य केवल यह नहीं पूछता कि “क्या हो रहा है?”

वह पूछता है— “इसका अर्थ क्या है?”

एक घटना घटती है। विज्ञान उसके कारणों को समझ सकता है। इतिहास उसके क्रम को बता सकता है। लेकिन मनुष्य फिर भी पूछ सकता है—“इस घटना का मेरे जीवन के लिए क्या अर्थ है?”

यहाँ “अर्थ” और “कारण” के बीच का अन्तर स्पष्ट होता है।

कारण बताता है कि कोई घटना क्यों घटी।

अर्थ पूछता है कि वह घटना हमारे लिए क्या बनती है।

दर्शन इन दोनों प्रश्नों के बीच सम्बन्ध को समझने का प्रयास करता है।

यही कारण है कि दर्शन मनुष्य के जीवन से जुड़ा रहता है। वह केवल ब्रह्माण्ड की संरचना पर विचार नहीं करता; वह यह भी पूछता है कि उस ब्रह्माण्ड में मनुष्य अपने जीवन को किस प्रकार समझता है।

क्या दर्शन मनुष्य को उत्तर देता है?

यहाँ एक सामान्य अपेक्षा सामने आती है।

लोग दर्शन से उत्तर चाहते हैं।

वे पूछते हैं—जीवन का अर्थ क्या है? सत्य क्या है? ईश्वर है या नहीं? मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?

लेकिन दर्शन का काम हमेशा निश्चित उत्तर देना नहीं है।

कभी-कभी दर्शन का सबसे बड़ा योगदान यह होता है कि वह किसी ऐसे प्रश्न को स्पष्ट कर देता है जिसे मनुष्य अस्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था।

मनुष्य दुःखी है, लेकिन उसे यह स्पष्ट नहीं कि उसका दुःख किस प्रकार का है। दर्शन दुःख की संरचना को देखने का प्रयास करता है।

मनुष्य स्वतंत्रता चाहता है, लेकिन उसे यह ज्ञात नहीं कि स्वतंत्रता से उसका आशय क्या है। दर्शन इस इच्छा की जाँच करता है।

मनुष्य सत्य चाहता है, लेकिन सत्य की परिभाषा अस्पष्ट है। दर्शन पहले यह पूछता है कि सत्य की खोज का अर्थ क्या है।

इस अर्थ में दर्शन हमेशा उत्तरों का उत्पादक नहीं है।

कभी-कभी वह प्रश्नों को अधिक ईमानदार और अधिक स्पष्ट बनाने वाला अनुशासन है।

दर्शन की यह विशेषता उसे असुविधाजनक बनाती है।

क्योंकि मनुष्य अक्सर किसी निश्चित उत्तर से संतुष्ट होना चाहता है। दर्शन उस संतोष को चुनौती देता है। वह पूछता है—“क्या तुम सचमुच जानते हो?”

और कभी-कभी वह यह भी कहता है— “सम्भव है कि तुम्हारा प्रश्न ही अभी पर्याप्त स्पष्ट न हो।”

यहीं दर्शन मनुष्य के अस्तित्वगत प्रश्नों से जुड़ता है। वह संसार को समझने की यात्रा से प्रारम्भ होकर धीरे-धीरे मनुष्य के अपने होने तक पहुँचता है।

लेकिन अब एक और प्रश्न सामने है।

क्या दर्शन केवल विचार करने की प्रक्रिया है, या वह मनुष्य के जीवन को भी बदल सकता है?

यदि दर्शन केवल विचार है, तो उसका जीवन से क्या सम्बन्ध है?

और यदि वह जीवन को बदल सकता है, तो—

क्या किसी दर्शन को केवल उसके सिद्धान्तों से समझना पर्याप्त होगा?

अगले भाग में हम दर्शन और जीवन के बीच इसी सम्बन्ध का अध्ययन करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )


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