साहेब है रंगरेज... चुनर मोरी रंग डारि
साहेब है रंगरेज... चुनर मोरी रंग डारि
रूह (आत्मा) के रंग की दास्तान
"साहेब है रंगरेज... चुनर मोरी रंग डारि।"
यह केवल एक पद नहीं है, बल्कि सदियों से इंसान की रूह (आत्मा) में उतरती हुई एक सदा (पुकार) है। यह पुकार किसी बाज़ार के रंगरेज की नहीं, उस हक़ीक़ी रंगरेज (परम रंगने वाले) की है, जो रंग तो देता है, मगर रंगने से पहले धोता भी है।
दुनिया का हर रंग वक़्त के साथ फीका पड़ जाता है। शोहरत का रंग उतर जाता है। दौलत का रंग धुँधला हो जाता है। जिस्म की रौनक़ (चमक) ढल जाती है। रिश्तों की गर्माहट भी मौसमों के साथ बदल जाती है।
लेकिन एक रंग ऐसा भी है, जो न धूप से उड़ता है, न बरसात से धुलता है, न मौत उसे मिटा सकती है।
वह रंग इश्क़ का है।
वह रंग मआरिफ़त (आत्मिक ज्ञान) का है।
वह रंग हज़ूरी (ईश्वर की निकटता) का है।
और वही रंग साहेब अपनी रहमत (कृपा) से चुनर पर चढ़ाते हैं।
सूफ़ी कहते हैं कि इंसान की रूह एक सफ़ेद चादर लेकर इस दुनिया में आती है। फिर उस पर हवस (वासना), ग़ुरूर (अहंकार), ख़ौफ़ (भय), हसरत (अपूर्ण इच्छा), रंजिश (मनमुटाव), और लालच के दाग़ पड़ते जाते हैं।
हम समझते रहते हैं कि हम रंगीन हो रहे हैं।
हक़ीक़त (सत्य) यह है कि हम केवल दाग़दार होते जा रहे होते हैं।
इसीलिए कबीर कहते हैं—
"स्याही रंग छुड़ाय के रे, दियो मजीठा रंग।"
पहले पुराने रंग उतरेंगे।
फिर असली रंग चढ़ेगा।
जब तक प्याला ख़ाली न हो, उसमें अमृत कहाँ समाएगा?
जब तक आईना गर्द (धूल) से ढका है, चेहरा कहाँ दिखाई देगा?
जब तक दिल अपनी आवाज़ से भरा है, ख़ुदा की सदा कहाँ सुनाई देगी?
साहेब रंगरेज हैं।
वे केवल रंग नहीं बदलते, वे देखने वाली आँख भी बदल देते हैं।
पहले संसार बदलता हुआ दिखाई देता है।
फिर स्वयं बदलता हुआ दिखाई देता है।
और अन्ततः यह बोध होता है कि बदलने वाला भी वही है और बदलने वाला रंगरेज भी वही।
यहीं से फ़ना (अहंकार का विलय) का सफ़र शुरू होता है।
और बक़ा (परम सत्ता में स्थिरता) की सुबह उगती है।
रंगरेज कभी जल्दी नहीं करता।
उसे मालूम है कि कच्चे कपड़े पर गहरा रंग नहीं टिकता।
पहले वह चुनर को बार-बार पानी में भिगोता है।
धूप में सुखाता है।
धोता है।
मरोड़ता है।
फिर रंग में डुबोता है।
रूह का सफ़र भी ऐसा ही है।
ज़िंदगी की तकलीफ़ें शायद सज़ा नहीं होतीं।
वे रंगरेज की धुलाई भी हो सकती हैं।
कई बार जिस ग़म (दुःख) को हम बदनसीबी समझते हैं, वही भीतर की सबसे बड़ी सफ़ाई बन जाता है।
इश्क़ का रंग अजीब है।
उसे चढ़ाने के लिए कोई कूची नहीं चाहिए।
न कोई रंग का डिब्बा।
बस एक दिल चाहिए, जो अपने होने के दावे से ख़ाली हो।
जो झुकना जानता हो।
जो रोना जानता हो।
जो शुक्र (कृतज्ञता) करना जानता हो।
जो अपने टूटने से भी इंकार न करे।
क्योंकि टूटे हुए बर्तन में ही कई बार आसमान का पूरा अक्स (प्रतिबिम्ब) दिखाई देता है।
उपनिषद् कहते हैं—"तत्त्वमसि।"
सूफ़ी कहते हैं—"अनल-हक़।"
कबीर कहते हैं—"लाली मेरे लाल की।"
तीनों की मंज़िल एक ही है।
जब रंग इतना गहरा हो जाए कि चुनर दिखाई ही न दे, केवल रंग दिखाई दे।
जब साधक दिखाई न दे, केवल साध्य दिखाई दे।
जब प्रेमी मिट जाए और केवल प्रेम रह जाए।
साहेब रंगरेज हैं।
वे हमारे कपड़े नहीं, हमारी क़िस्मत (भाग्य) नहीं, हमारी पहचान भी नहीं रंगते।
वे हमारी नज़र रंगते हैं।
नज़र बदल जाए तो वही संसार, जो कल तक कैदख़ाना लगता था, आज ख़ुदा की तजल्ली (दिव्य आभा) बन जाता है।
वही हवा इबादत हो जाती है।
वही ख़ामोशी ज़िक्र बन जाती है।
वही साँस प्रार्थना बन जाती है।
शायद इसी लिए संतों ने कहा—
"साहेब है रंगरेज... चुनर मोरी रंग डारि।"
क्योंकि इस संसार में सबसे बड़ी नेमत (अनमोल कृपा) यह नहीं कि हमें नया वस्त्र मिल जाए।
सबसे बड़ी नेमत यह है कि हमारी पुरानी चुनर पर ऐसा रंग चढ़ जाए—
जो जन्मों तक न उतरे,
जो मृत्यु भी न धो सके,
और जिसे देखकर स्वयं साहेब मुस्कुरा उठें।
तब रूह ख़ामोशी से कहती है—
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