बारिश की शाम और तुम
बारिश की शाम और तुम
आज की बारिश
कुछ अलग है।
इसमें सिर्फ़ पानी नहीं बरस रहा,
जाने क्यों
तुम्हारी यादों की ख़ुशबू भी
घुलती चली जा रही है।
खिड़की के शीशे पर
फिसलती हुई हर बूँद,
तुम्हारे नाम का
एक अधूरा हरफ़ लिखती है,
और हवा...
उसे मिटाने के बजाय
और गहरा कर देती है।
मैंने हथेली बाहर निकाली,
एक बूँद आकर ठहर गई।
उसे देखकर
यूँ लगा,
जैसे तुम्हारी हँसी ने
अपना लिबास बदल लिया हो
आज वह
मुस्कुराहट नहीं,
बारिश बनकर उतरी है।
तुम होतीं,
तो यक़ीनन
इस भीगी हुई शाम में
ज़रा-सा चेहरा आसमान की ओर उठाकर
आँखें बंद कर लेतीं,
और फिर
बचपन की तरह
बेवजह हँस पड़तीं।
मैं तुम्हें देखता रहता...
उस तरह,
जिस तरह कोई शायर
अपनी सबसे ख़ूबसूरत ग़ज़ल
लिखने से पहले
देर तक
एक ख़ामोश लफ़्ज़ को देखता है।
बारिश थम भी जाए,
तो क्या...
कुछ मौसम
ज़मीन पर नहीं,
इंसान के भीतर बरसते हैं।
और तुम...
तुम उन मौसमों में से हो,
जो हर बरसात के साथ
फिर से लौट आते हैं।
इसलिए
जब भी बादल
धीरे-धीरे आसमान पर छा जाते हैं,
मैं दुआ नहीं करता
कि बारिश रुक जाए।
मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ—
कहीं उसी बारिश के बीच
तुम्हारी हँसी
एक बार फिर
हवा में घुल जाए,
और मैं
भीगता हुआ
उसे अपनी रूह में
हमेशा के लिए महफ़ूज़ कर लूँ।
— मुकेश
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