दर्शन — रामानुज का विशिष्टाद्वैत — भाग–11 : विशिष्टाद्वैत और श्रीवैष्णव परम्परा

 रामानुज का विशिष्टाद्वैतइतिहास, दर्शन, भक्ति और आधुनिक चिन्तन के आलोक में समग्र अध्ययन

दर्शनभाग–11 : विशिष्टाद्वैत और श्रीवैष्णव परम्पराआलवारों से रामानुज तक और उसके बाद

अब तक की इस श्रृंखला में हमने विशिष्टाद्वैत के दार्शनिक सिद्धान्त, साधना-पद्धति, मोक्ष-दर्शन, प्रमुख ग्रन्थों तथा अन्य वेदान्त परम्पराओं से उसकी तुलना का अध्ययन किया। परन्तु कोई भी दर्शन केवल ग्रन्थों में जीवित नहीं रहता। वह तब तक जीवित नहीं रह सकता, जब तक वह समाज, संस्कृति, आस्था, पूजा-पद्धति और जीवन-मूल्यों का अंग बन जाए।

रामानुजाचार्य का सबसे बड़ा योगदान केवल विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन नहीं था। उन्होंने एक ऐसी जीवंत धार्मिक-सांस्कृतिक परम्परा को संगठित रूप दिया, जिसे आज श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है।

यह सम्प्रदाय केवल दर्शन नहीं है

यह भक्ति है, यह मंदिर-संस्कृति है, यह सामाजिक समावेश का आन्दोलन है, यह संस्कृत और तमिलदोनों परम्पराओं का अद्भुत समन्वय है।

श्रीवैष्णव सम्प्रदाय क्या है?

श्रीवैष्णव सम्प्रदाय भगवान श्रीमन नारायण तथा महालक्ष्मी की उपासना पर आधारित वैष्णव परम्परा है।

यहाँ "श्री" शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह केवल लक्ष्मी का नाम नहीं, बल्कि कृपा, करुणा और मध्यस्थता (Mediation) का दार्शनिक प्रतीक है।

श्रीवैष्णव मत के अनुसारजीव भगवान तक पहुँचने में श्री (लक्ष्मी) की अनुकम्पा से समर्थ होता है। इसी कारण सम्प्रदाय का नाम केवल "वैष्णव" नहीं, बल्कि श्रीवैष्णव है।

आलवार संत : भक्ति की आधारशिला

रामानुजाचार्य से पहले दक्षिण भारत में आलवार संतों ने भक्ति की ऐसी धारा प्रवाहित की जिसने विशिष्टाद्वैत के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक भूमि तैयार की।

"आलवार" शब्द का अर्थ हैजो भगवान के प्रेम में पूर्णतः निमग्न हो गया हो। परम्परा में बारह आलवार माने जाते हैं।

इनमें प्रमुख हैंपूयगै आलवार, भूतत्तालवार, पेयालवार, नम्मालवार, आंडाल, तिरुमंगै आलवार, कुलशेखर आलवार, पेरियालवार

इन संतों की विशेषता यह थी कि उन्होंने दार्शनिक सिद्धान्तों को जनभाषा में भक्ति के माध्यम से जीवंत बना दिया।

नम्मालवार का योगदान

यदि आलवारों में किसी एक संत का सर्वाधिक प्रभाव रामानुजाचार्य पर माना जाता है, तो वे हैंनम्मालवार।उनकी रचना तिरुवायमोलि को अनेक विद्वान "तमिल वेद" कहते हैं।

इस ग्रन्थ मेंईश्वर-प्रेम, शरणागति, आत्मसमर्पण, भगवत्सम्बन्ध, का अत्यन्त गहन वर्णन मिलता है।

रामानुजाचार्य ने इन भावों को दार्शनिक रूप प्रदान किया।

आंडाल : भक्ति की अद्वितीय स्वरधारा

बारह आलवारों में आंडाल एकमात्र महिला संत हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँतिरुप्पावै, नाचियार तिरुमोऴि

आज भी दक्षिण भारत के मंदिरों और घरों में अत्यन्त श्रद्धा से गाई जाती हैं।

आंडाल की भक्ति में भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और आत्मनिवेदन का जो स्वर मिलता है, उसने श्रीवैष्णव परम्परा को गहराई से प्रभावित किया।

दिव्यप्रबन्धम् : तमिल वेद

आलवारों की लगभग चार हजार तमिल रचनाओं का संग्रह नालायिर दिव्यप्रबन्धम् कहलाता है। श्रीवैष्णव परम्परा में इसे अत्यन्त सम्मान प्राप्त है। इसे कभी-कभी "द्राविड़ वेद" या "तमिल वेद" भी कहा जाता है।

यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात दिखाई देती हैरामानुजाचार्य ने केवल संस्कृत शास्त्रों को महत्त्व नहीं दिया,

उन्होंने तमिल भक्ति-साहित्य को भी समान आदर दिया।

यह भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का अद्भुत उदाहरण है।

रामानुजाचार्य का संगठनात्मक कार्य

रामानुजाचार्य केवल दार्शनिक नहीं थे,वे एक महान संगठनकर्ता भी थे।

उन्होंने 

  • श्रीरंगम् मंदिर की व्यवस्था का पुनर्गठन किया। पूजा-पद्धति को व्यवस्थित किया। अनेक मठों की स्थापना की। शिष्यों की परम्परा विकसित की। सम्प्रदाय के अनुशासन को सुदृढ़ बनाया।

उनके कारण श्रीवैष्णव परम्परा एक संगठित धार्मिक आन्दोलन बन सकी।

सामाजिक समावेश

रामानुजाचार्य के जीवन का एक अत्यन्त प्रेरणादायक पक्ष उनका सामाजिक दृष्टिकोण है। परम्पराओं में अनेक प्रसंग मिलते हैं कि उन्होंने भक्ति के मार्ग को केवल उच्च वर्ग तक सीमित नहीं रखा।

उन्होंने यह प्रतिपादित किया किईश्वर की कृपा सभी के लिए है।

यद्यपि इतिहासकार इन कथाओं के विभिन्न पक्षों की समीक्षा करते हैं, फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि रामानुजाचार्य ने श्रीवैष्णव परम्परा को अधिक व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया।

वडकलै और तेंकलै

रामानुजाचार्य के बाद श्रीवैष्णव परम्परा में दो प्रमुख शाखाएँ विकसित हुईं

1. वडकलै (Vaakalai)

इस परम्परा मेंसंस्कृत शास्त्रों पर अपेक्षाकृत अधिक बल है। भक्ति के साथ साधक के पुरुषार्थ को विशेष महत्त्व दिया जाता है। वेदान्तदेशिक इसके प्रमुख आचार्य माने जाते हैं।

2. तेंकलै (Tekalai)

इस परम्परा मेंतमिल आलवार साहित्य को विशेष महत्त्व प्राप्त है। ईश्वर की कृपा को अधिक निर्णायक माना जाता है। पिल्लै लोकाचार्य और मनवल ममुनि इसके प्रमुख आचार्य हैं।

"वानर-शिशु" और "मार्जार-शिशु" न्याय

दोनों परम्पराओं के अन्तर को समझाने के लिए प्रसिद्ध उदाहरण दिए जाते हैं।

 

वडकलै - वानर-शिशु न्याय

जैसे बन्दर का बच्चा अपनी माता को स्वयं पकड़कर लटकता है, वैसे ही साधक को भी पुरुषार्थ करना चाहिए।

तेंकलै

मार्जार-शिशु न्याय

जैसे बिल्ली अपने बच्चे को स्वयं उठाकर ले जाती है, वैसे ही ईश्वर की कृपा साधक को मोक्ष तक पहुँचाती है।

ध्यान देने योग्य बात यह है किदोनों परम्पराएँ रामानुजाचार्य का सम्मान करती हैं।

उनका मतभेद मूल दर्शन में नहीं, बल्कि कृपा और पुरुषार्थ के अनुपात पर है।

मंदिर-परम्परा

श्रीवैष्णव परम्परा में मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है।

वहशिक्षा का केन्द्र, संगीत का केन्द्र, नृत्य का केन्द्र, दर्शन का केन्द्र, समाज का केन्द्र, भी रहा है।

विशेष रूप सेश्रीरंगम्, काञ्चीपुरम्, तिरुपति, मेलकोटे, जैसे तीर्थ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के जीवंत केन्द्र हैं।

संस्कृत और तमिल का समन्वय

रामानुजाचार्य का सबसे बड़ा सांस्कृतिक योगदान यह था कि उन्होंनेसंस्कृत की दार्शनिक परम्परा और

तमिल की भक्तिपरम्परा को एक सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने यह नहीं कहा कि केवल संस्कृत ही पवित्र है।

उन्होंने यह भी नहीं कहा कि केवल लोकभाषा ही पर्याप्त है।

उनकी दृष्टि मेंशास्त्र और भक्ति, तर्क और प्रेम, संस्कृत और तमिलसभी मिलकर धर्म को पूर्ण बनाते हैं।

आधुनिक दृष्टि से महत्त्व

आज जब भाषा, क्षेत्र और संस्कृति के आधार पर समाज विभाजित होता दिखाई देता है, तब श्रीवैष्णव परम्परा हमें यह सिखाती है कि विविध भाषाएँ और परम्पराएँ परस्पर विरोधी नहीं होतीं।

वे एक ही आध्यात्मिक सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं।

दार्शनिक संवाद

समकालीन समाजशास्त्र और धर्म-अध्ययन (Religious Studies) में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण माना जाता है कि कोई दार्शनिक विचार समाज में कैसे जीवित रहता है। केवल ग्रन्थ किसी परम्परा को दीर्घजीवी नहीं बनाते; उसके लिए संस्थाएँ, अनुष्ठान, भाषा, संगीत, समुदाय और सांस्कृतिक स्मृति भी आवश्यक होती है।

श्रीवैष्णव परम्परा इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। रामानुजाचार्य का दर्शन केवल शास्त्रीय भाष्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आलवारों की भक्ति, मंदिर-परम्परा, सामूहिक उपासना और गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से एक जीवंत सामाजिक संस्कृति बन गया। आधुनिक धर्म-अध्ययन की दृष्टि से यह दर्शन और संस्कृति के सफल समन्वय का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

मुख्य निष्कर्ष

  • श्रीवैष्णव सम्प्रदाय विशिष्टाद्वैत का जीवंत धार्मिक और सांस्कृतिक रूप है।
  • आलवार संतों ने भक्ति की भावभूमि तैयार की, जिसे रामानुजाचार्य ने दार्शनिक आधार दिया।
  • दिव्यप्रबन्धम् श्रीवैष्णव परम्परा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
  • वडकलै और तेंकलै परम्पराओं में मूल दर्शन समान है; मतभेद कृपा और पुरुषार्थ की व्याख्या में है।
  • रामानुजाचार्य ने संस्कृत और तमिल परम्पराओं का अद्वितीय समन्वय किया।
  • श्रीवैष्णव सम्प्रदाय दर्शन, भक्ति, समाज और संस्कृति का समन्वित रूप है।

 

आज के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न

  1. क्या दर्शन तभी जीवित रहता है जब वह समाज और संस्कृति का अंग बन जाए?
  2. क्या भाषा की विविधता आध्यात्मिक एकता में बाधा है या उसकी शक्ति?
  3. क्या आज के धार्मिक समुदाय रामानुजाचार्य की समन्वयकारी दृष्टि से कुछ सीख सकते हैं?
  4. क्या भक्ति और संगठन का संतुलन किसी भी आध्यात्मिक आन्दोलन की दीर्घायु का आधार बन सकता है?

अगले भाग की भूमिका

अगले भाग में हम "विशिष्टाद्वैत और भारतीय दर्शन में उसका योगदान" का समग्र अध्ययन करेंगे। वहाँ यह देखा जाएगा कि रामानुजाचार्य के दर्शन ने वेदान्त, भक्ति आन्दोलन, भारतीय समाज, संस्कृति, तर्कशास्त्र और धार्मिक चिन्तन को किस प्रकार प्रभावित किया तथा भारतीय बौद्धिक इतिहास में उसका स्थायी स्थान क्या है।

 

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)

 

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